उत्तराखंड:तेल कंपनियों का मुनाफा बढ़ा, जनता पर महंगाई की मार क्यों? यशपाल आर्य ने साधा सरकार पर निशाना
देहरादून
नेता प्रतिपक्ष Yashpal Arya ने पेट्रोल और डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों को लेकर केंद्र सरकार और सरकारी तेल कंपनियों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि महंगाई से पहले ही परेशान आम जनता, किसानों, छोटे व्यापारियों और मध्यम वर्ग पर ईंधन मूल्य वृद्धि का अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा है।
यशपाल आर्य ने कहा कि एक ओर केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री सरकारी तेल कंपनियों को प्रतिदिन लगभग एक हजार करोड़ रुपये के घाटे की बात कह रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुख तेल कंपनियों के वित्तीय आंकड़े अलग तस्वीर पेश करते हैं। उनके अनुसार, उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक इन कंपनियों ने वर्ष 2026 की चौथी तिमाही, यानी जनवरी से मार्च के बीच करीब 19,470 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 41 प्रतिशत अधिक बताया जा रहा है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब कंपनियां भारी लाभ में थीं, तो अचानक घाटे की स्थिति कैसे पैदा हो गई। आर्य ने कहा कि यदि अंतरराष्ट्रीय हालात और युद्ध का हवाला दिया जा रहा है, तो यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि युद्ध 28 फरवरी से शुरू हुआ था और उसका प्रत्यक्ष आर्थिक असर अप्रैल से माना जा सकता है। ऐसे में कथित घाटे की अवधि लगभग 40 दिनों के आसपास ही बनती है।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि इसके बावजूद 10 मई के बाद से लगातार पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी हो रही है। इससे जनता के बीच यह धारणा मजबूत हो रही है कि सीमित अवधि के संभावित नुकसान को आधार बनाकर लंबे समय तक कीमतें बढ़ाई जा रही हैं। उन्होंने कहा कि सवाल यह है कि कुछ दिनों के घाटे की भरपाई जनता की जेब से क्यों की जाए, जबकि उससे पहले कंपनियां हजारों करोड़ रुपये का मुनाफा कमा चुकी थीं।
आर्य ने कहा कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों का असर केवल वाहनों तक सीमित नहीं रहता। ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है, खाद्यान्न और सब्जियों के दाम बढ़ते हैं, खेती महंगी होती है और छोटे कारोबार प्रभावित होते हैं। इसका सीधा असर हर परिवार के घरेलू बजट पर पड़ता है।
उन्होंने कहा कि जनता यह जानना चाहती है कि सरकारी कंपनियों का उद्देश्य केवल लाभ कमाना है या कठिन समय में लोगों को राहत देना भी उनकी जिम्मेदारी है। उनका कहना था कि जब कंपनियों को मुनाफा हुआ, तब उसका लाभ आम लोगों तक नहीं पहुंचा, लेकिन घाटे की बात आते ही उसका बोझ सीधे जनता पर डाल दिया गया।

यशपाल आर्य ने मांग की कि तेल मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाई जाए और वास्तविक तथ्य जनता के सामने रखे जाएं। उन्होंने कहा कि संकट की परिस्थितियों को राजस्व बढ़ाने या कीमतें बढ़ाने का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में सरकारें जनता के लिए होती हैं, न कि जनता सरकारों और कंपनियों के मुनाफे के लिए।