उत्तराखण्डः 14 से 25 साल जेल में काट चुके पात्र कैदियों की प्रीमैच्योर रिलीज पर हाईकोर्ट सख्त! सरकार से मांगा जवाब
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा काट चुके कैदियों की रिहाई से जुड़े मामले में सुनवाई की। अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के बावजूद कैदियों को रिहा न करने पर पूर्व में राज्य सरकार से जवाब मांगा था। न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने स्वतः संज्ञान लेते हुए दायर जनहित याचिका और अन्य कैदियों की याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की। राज्य सरकार की ओर से अदालत में काउंटर दाखिल करने के साथ ही कुछ कैदियों की रिहाई से संबंधित सूची भी पेश की गई। इसके बाद दो अन्य कैदियों के मामले में भी कोर्ट ने आदेश जारी किए हैं। इनमें मधुमिता शुक्ला हत्याकांड के दोषी संतोष राय का नाम भी शामिल है। कोर्ट के आदेश के मुताबिक, संबंधित दस्तावेज जेल पहुंचने के बाद उनकी रिहाई की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
बता दें कि यह मामला उत्तराखंड सरकार की समयपूर्व रिहाई यानी प्रीमैच्योर रिलीज पॉलिसी के क्रियान्वयन से जुड़ा है। याचिका में उन कैदियों की रिहाई का मुद्दा उठाया गया है, जो 14 साल या उससे अधिक समय से जेल में बंद हैं। इनमें कई कैदी 20 से 25 साल तक की सजा काट चुके हैं। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि राज्य सरकार की नीति के तहत पात्र कैदियों की समयपूर्व रिहाई के मामलों पर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। उम्रकैद का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि कैदी को हर परिस्थिति में जीवनभर जेल में ही रहना पड़े। हालांकि, रिहाई का निर्णय संबंधित नीति, पात्रता और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अधीन होगा। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने पहले कुछ कैदियों की रिहाई से संबंधित जानकारी दी थी। इसके बाद सरकार की ओर से एक और सूची उपलब्ध कराई गई, जिसमें कुछ अन्य कैदियों के नाम शामिल हैं। दो कैदियों के मामले में अदालत ने आदेश देते हुए कहा कि संबंधित दस्तावेज जेल पहुंचने के बाद उनकी रिहाई की प्रक्रिया पूरी की जाए। अदालत को बताया गया कि इस संबंध में जुलाई और सितंबर में भी बैठकें हुई थीं। जेल प्रशासन की ओर से समयपूर्व रिहाई के पात्र मामलों पर कार्रवाई की जा रही है और चरणबद्ध तरीके से कैदियों को रिहा किया जा रहा है। हालांकि, अब तक कुल कितने कैदियों को रिहा किया गया है, इसका सटीक आंकड़ा फिलहाल उपलब्ध नहीं है।