उत्तराखंडः यूसीसी के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर हाईकोर्ट में सुनवाई! जवाब दाखिल करने के निर्देश, अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को
नैनीताल। उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट के सामने दलील दी गई कि यूसीसी के कुछ प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 25, 29 और 30 में दिए गए अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से खास तौर पर कहा गया कि यूसीसी के कुछ प्रावधान मुस्लिम समुदाय के व्यक्तिगत कानून यानी पर्सनल लॉ और शरीयत से जुड़े प्रावधानों को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के तौर पर इद्दत की व्यवस्था का हवाला देते हुए कहा गया कि यूसीसी में इसे समाप्त कर दिया गया है और तलाक से जुड़े मामलों में सीधे सिविल कोर्ट के प्रावधान लागू किए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ऐसे प्रावधान उनके पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप करते हैं और इसी आधार पर यूसीसी के प्रावधानों को चुनौती दी गई है। वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने प्रदेश सरकार द्वारा लागू किए गए समान नागरिक संहिता (यूसीसी) बिल के खिलाफ दायर 11 जनहित याचिकाओं और पीड़ित प्रेमी जोड़ों के मामलों पर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से उपस्थित होने वाले सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अदालत में पेश न हो पाने के कारण सरकार ने अतिरिक्त समय की मांग की। अदालत ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए सभी पक्षकारों की सहमति से अगली सुनवाई के लिए 12 अक्टूबर की तिथि तय कर दी और तब तक संबंधित पक्षों को अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। बता दें कि भीमताल निवासी सुरेश सिंह नेगी ने यूसीसी के विभिन्न प्रावधानों को जनहित याचिका के रूप में चुनौती दी है। जिसमे मुख्यतः ‘लिव इन रिलेशनशिप’ के प्रावधानों को चुनौती दी गई है। इसके अलावा मुस्लिम, पारसी आदि के वैवाहिक पद्धति की यूसीसी में अनदेखी किए जाने सहित कुछ अन्य प्रावधानों को भी चुनौती दी गई है। वहीं देहरादून निवासी एलमसुद्दीन सिद्दीकी ने रिट याचिका दायर कर यूसीसी 2025 के कई प्रावधानों को चुनौती दी है। जिसमें अल्पसंख्यकों के रीति-रिवाजों की अनदेखी किये जाने का उल्लेख है।