उत्तराखण्डः अवैध पेड़ कटान और सामाजिक बहिष्कार मामले में सुनवाई! हाईकोर्ट ने सरकार, डीएफओ और एसडीएम से मांगा जवाब, तीन सप्ताह में देनी होगी विस्तृत रिपोर्ट
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने देहरादून जनपद के विकासनगर क्षेत्र स्थित ग्राम सभा तौली में कथित अवैध पेड़ कटान और शिकायतकर्ताओं के सामाजिक बहिष्कार के मामले में सुनवाई की। मामले की सुनवाई के बाद मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खण्डपीठ ने राज्य सरकार से पूछा है कि 20 जनवरी 2026 को ग्रामीणों द्वारा की गई शिकायत के बाद अब तक क्या कार्रवाई की गई है। अवैध कटान के मामले में क्या एक्शन हुआ है और इसके लिए पूर्व में दो सप्ताह का समय दिया था। आज मामले की फिर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकार से दोबारा पूछा है कि अब तक क्या कार्रवाई हुई, तो सरकारी पक्ष ने 12 जून की एक रिपोर्ट पेश की, जिसमें सिर्फ इतना कहा गया था कि साइट इंस्पेक्शन किया जाएगा। कोर्ट ने पूछा कि जब अवैध कटान हुआ है तो क्या वहां दोबारा पेड़ लगाए गए? जिन लोगों ने अवैध तरीके से पेड़ काटे, उन पर क्या कार्रवाई हुई? इस पर सरकार कोई ठोस जवाब या ठोस कदम नहीं बता पाई।
इसी को संज्ञान में लेते हुए उच्च न्यायालय ने सरकार, संबंधित क्षेत्र के डीएफओ और एसडीएम विकासनगर को तीन सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया है कि वे स्पष्ट रूप से बताएं कि अवैध कटान पर क्या एक्शन लिया गया है। मामले की अगली सुनवाई के लिए तीन सप्ताह बाद की तिथि नियत की गई है। बताते चलें कि विकासनगर क्षेत्र स्थित ग्राम सभा तौली के छह ग्रामीणों गोपाल सिंह, विनोद कुमार चौहान समेत अन्य ने जनहित याचिका दायर कर कहा कि जनवरी 2026 के दौरान गांव में बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई की गई, जिसकी शिकायत उन्होंने वन विभाग के अधिकारियों से करते हुए जांच की मांग की थी। शिकायत के बाद प्रभागीय वनाधिकारी (डीएफओ) द्वारा कराई गई जांच में 54 पेड़ों के कटे होने तथा 29 अन्य पेड़ों को अत्यधिक शाखा कटान (एक्सेसिव लॉपिंग) के कारण गंभीर क्षति पहुंचने की पुष्टि हुई। रिपोर्ट में पीपल, आम समेत विभिन्न प्रजातियों के पेड़ों को नुकसान पहुंचाने का उल्लेख किया गया है। जांच रिपोर्ट सामने आने के बावजूद दोषियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। साथ ही पेड़ कटान का विरोध करने वाले छह ग्रामीणों के खिलाफ ग्राम सभा में प्रस्ताव पारित कर उन्हें सामाजिक रूप से बहिष्कृत किए जाने, उन पर जुर्माना लगाने तथा गांव स्तर पर उनका सामाजिक बहिष्कार करने के आरोप भी लगाए गए हैं।