उत्तराखंड:‘घी खाणु कुन, गनेल न बनणु’... आज पहाड़ में है घी का त्यार, नहीं खाया तो ‘गनेल’ का अवतार! और क्या होता है ओलग? जानिए पहाड़ की इस अनोखी मान्यता को
उत्तराखंड की लोक संस्कृति अपनी अनूठी परंपराओं और प्रकृति से गहरे जुड़ाव के लिए जानी जाती है। यहां वर्षभर अलग-अलग लोकपर्व मनाए जाते हैं, जिनमें स्थानीय जीवन, कृषि, पशुपालन और पारिवारिक रिश्तों की झलक दिखाई देती है। इन्हीं महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है घी संक्रांति, जिसे कुमाऊं में घ्यूं त्यार, घ्यूं संक्रांत और कई क्षेत्रों में ओलकिया या ओलगी संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है।
भाद्रपद मास की संक्रांति के दिन मनाया जाने वाला यह पर्व मुख्य रूप से कृषि और पशुपालन से जुड़ा माना जाता है। बरसात के मौसम में खेतों में नई फसलों में बालियां आने लगती हैं और पहाड़ों में पशुओं को पर्याप्त हरी घास मिलने से दूध, दही, मक्खन और घी का उत्पादन भी बढ़ जाता है। ऐसे में घी संक्रांति किसानों के लिए प्रकृति और मेहनत के प्रति आभार व्यक्त करने तथा अच्छी फसल की कामना का पर्व भी है।
चंद राजाओं के समय से चली आ रही ‘ओलग’ की परंपरा
घी संक्रांति को ओलकिया या ओलगी संक्रांति कहे जाने के पीछे उत्तराखंड की पुरानी सामाजिक परंपराओं का भी संबंध है। कुमाऊं में चंद राजाओं के शासनकाल के दौरान इस दिन शिल्पकार और दस्तकार अपनी बनाई वस्तुएं दरबार में भेंट करते थे। कृषि से जुड़े लोग भी अपने खेतों में पैदा हुई सब्जियां, फल, दूध-दही, घी, मिष्ठान और अन्य उपयोगी वस्तुएं राजदरबार में ले जाते थे। इस परंपरा को ‘ओलग’ देने की परंपरा कहा जाता था। समय के साथ यह परंपरा राजदरबार तक सीमित न रहकर सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों का हिस्सा बन गई। कई क्षेत्रों में बेटी के ससुराल पक्ष की ओर से उसके मायके में ककड़ी, मूली, घी, केले और अन्य स्थानीय उपज भेंट करने की परंपरा भी रही है। आज भी उत्तराखंड के कई इलाकों में इस पर्व पर अपने खेतों की उपज और स्थानीय खाद्य सामग्री एक-दूसरे को भेंट करने की परंपरा निभाई जाती है।
पकवानों से महकते हैं पहाड़ी घर
घी संक्रांति पर उत्तराखंड के पहाड़ी घरों में पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। उड़द की दाल से तैयार बेडू की रोटी, पूरी, रोटी, बड़े, पुए, ककड़ी का रायता, खीर और स्थानीय सब्जियां इस पर्व के पारंपरिक भोजन का हिस्सा हैं। अरबी के कोमल पत्तों से बनाई जाने वाली गाबे की सब्जी भी इस दिन विशेष रूप से बनाई जाती है। कई जगह गाबे के पत्तों पर बेसन लगाकर उनसे पारंपरिक पकवान तैयार किए जाते हैं। इस पर्व की सबसे खास पहचान भोजन में घी का भरपूर इस्तेमाल है। घी को समृद्धि, स्वास्थ्य और खुशहाली का प्रतीक मानते हुए इस दिन विशेष रूप से खाया जाता है। लोकमान्यता है कि जो व्यक्ति घी संक्रांति के दिन घी नहीं खाता, उसे अगले जन्म में ‘गनेल’ यानी घोंघा बनना पड़ता है। यही मान्यता इस पर्व को लोकजीवन में और भी रोचक बनाती है। कई क्षेत्रों में इस दिन नाक और सिर पर घी लगाने की परंपरा भी है। लोकगीतों और कहावतों में भी घी संक्रांति का उल्लेख मिलता है। पहाड़ की यह मान्यता और परंपरा सिर्फ खान-पान तक सीमित नहीं है, बल्कि खेत, पशु, परिवार, रिश्ते और प्रकृति के साथ उत्तराखंड के लोगों के गहरे जुड़ाव को भी दर्शाती है। घी संक्रांति इसलिए महज एक पर्व नहीं, बल्कि उत्तराखंड की कृषि संस्कृति, लोकविश्वास और सामुदायिक जीवन की जीवंत तस्वीर है, जो पीढ़ियों से पहाड़ की परंपराओं को आगे बढ़ा रही है।