उत्तराखंड बना देश का छठा पूर्ण साक्षर राज्य! 26 वर्षों की विकास यात्रा में शिक्षा का स्वर्णिम अध्याय, राज्य आंदोलन के सपनों को नई उड़ान, रचा साक्षरता का इतिहास
देवभूमि उत्तराखंड ने एक और ऐतिहासिक उपलब्धि अपने नाम दर्ज कर ली है। राज्य ने खुद को "पूर्ण साक्षर राज्य" घोषित कर दिया है। केंद्र सरकार के उल्लास (Understanding Lifelong Learning for All in Society) कार्यक्रम के तहत उत्तराखंड की साक्षरता दर 98 प्रतिशत से अधिक पहुंच गई है, जो निर्धारित 95 प्रतिशत के मानक से काफी ऊपर है। इसके साथ ही उत्तराखंड देश का छठा पूर्ण साक्षर राज्य बनने की उपलब्धि हासिल करने जा रहा है। यह उपलब्धि इसलिए भी विशेष है क्योंकि आज से मात्र 26 वर्ष पहले, 9 नवंबर 2000 को जब उत्तराखंड तत्कालीन उत्तर प्रदेश से अलग होकर देश के 27वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया था, तब राज्य के सामने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आधारभूत सुविधाओं की बड़ी चुनौतियां थीं। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों और सीमित संसाधनों के बावजूद उत्तराखंड ने विकास की जिस यात्रा को तय किया है, उसमें यह उपलब्धि एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज होगी।
बता दें कि हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड का क्षेत्रफल लगभग 53,483 वर्ग किलोमीटर है। राज्य में वर्तमान में 13 जिले हैं और जनसंख्या करीब 1.1 करोड़ के आसपास है। प्राकृतिक सौंदर्य, धार्मिक आस्था, सैन्य परंपरा और पर्यावरणीय महत्व के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध उत्तराखंड अब शिक्षा के क्षेत्र में भी राष्ट्रीय पहचान स्थापित कर रहा है। राज्य गठन के बाद वर्ष 2001 की जनगणना में उत्तराखंड की साक्षरता दर लगभग 71.6 प्रतिशत दर्ज की गई थी। उस समय पहाड़ों के दूरस्थ गांवों तक शिक्षा पहुंचाना एक बड़ी चुनौती माना जाता था। लेकिन बीते ढाई दशकों में सरकारों, शिक्षकों, स्वयंसेवी संगठनों, पंचायतों और स्थानीय समुदायों के संयुक्त प्रयासों ने तस्वीर बदल दी। महिलाओं, अनुसूचित जाति एवं जनजाति समुदायों, प्रवासी श्रमिक परिवारों और दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों तक शिक्षा पहुंचाने के लिए विशेष अभियान चलाए गए।
उत्तराखंड की यह सफलता केवल सरकारी आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक परिवर्तन की एक व्यापक कहानी है। शिक्षा के माध्यम से हजारों लोगों को नई पहचान, रोजगार के अवसर और बेहतर जीवन मिला है। जिन गांवों में कभी शिक्षा की पहुंच सीमित थी, वहां आज पढ़े-लिखे युवा देश और दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रहे हैं। उत्तराखंड राज्य आंदोलन की मूल भावना भी शिक्षा, रोजगार और बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ी थी। अलग राज्य की मांग को लेकर वर्षों तक चले जनांदोलन और अनेक बलिदानों के बाद अस्तित्व में आए उत्तराखंड ने अब शिक्षा के क्षेत्र में वह मुकाम हासिल कर लिया है, जो राज्य आंदोलन के सपनों को साकार करता दिखाई देता है।
देवभूमि के लिए यह उपलब्धि केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं, बल्कि उन लाखों नागरिकों, शिक्षकों और स्वयंसेवकों के अथक प्रयासों का सम्मान है जिन्होंने ज्ञान की रोशनी को हिमालय के दूरस्थ गांवों तक पहुंचाया। उत्तराखंड का पूर्ण साक्षर राज्य बनना न केवल प्रदेश के लिए गर्व का विषय है, बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रेरक उदाहरण भी है कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियां भी शिक्षा के मार्ग में बाधा नहीं बन सकतीं।