कांग्रेस में फेस की जंग, खिसकता जा रहा बेस: अपनों की घेराबंदी में उलझे दिग्गज
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस इस समय एक अजीबोगरीब अंतर्द्वंद्व से गुजर रही है। एक ओर जहाँ जमीनी स्तर पर पार्टी का आधार (बेस) लगातार दरकता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर दिग्गज नेताओं के बीच 'चेहरा' (फेस) बनने की होड़ मची हुई है। आलम यह है कि जनता के मुद्दों पर सरकार को घेरने के बजाय, पार्टी के 'क्षत्रप' एक-दूसरे की घेराबंदी के लिए फील्डिंग सजाने में ज्यादा मशरूफ नजर आ रहे हैं।
उत्तराखंड कांग्रेस में सत्ता की राह आसान नहीं दिख रही। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के दिग्गज नेताओं के बीच 'चेहरे' बनने की लड़ाई चरम पर पहुंच गई है। एक ओर जमीनी स्तर पर कांग्रेस का कैडर और वोट बैंक लगातार कमजोर हो रहा है, वहीं ऊपरी स्तर पर गुटबाजी और तीखी बयानबाजी ने पार्टी को अंदर से खोखला कर दिया है। पार्टी हाईकमान ने हाल ही में गणेश गोदियाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह, चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष डॉ. हरक सिंह रावत और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष एवं सीडब्ल्यूसी सदस्य करन माहरा को अहम जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इन पांचों को 'पंचमुखी' करार दिया था। लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह पंचमुखी व्यवस्था एकता की बजाय प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दे रही है।
प्रदेश की राजनीति में 2017 से लेकर 2024 तक कांग्रेस को लगातार करारी हार का सामना करना पड़ा। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में पार्टी अपना जनाधार नहीं बचा पाई। 2027 में सत्ता में वापसी का दावा किया जा रहा है, लेकिन चुनाव वर्ष की शुरुआत में ही नेताओं के बीच एक-दूसरे पर हमले और घेराबंदी ने इन दावों पर सवालिया निशान लगा दिया है। हर दिग्गज नेता प्रयासरत है कि पार्टी का आगामी चेहरा वह बने। इसके लिए अपने-अपने क्षत्रपों को मैदान में उतारकर विरोधियों की घेराबंदी की जा रही है। राजनीतिक विश्लेषक जय सिंह रावत कहते हैं,कांग्रेस कभी कैडर आधारित पार्टी नहीं रही। यही वजह है कि अनुशासनहीनता और गुटबाजी यहां खुलकर दिखाई देती है। भाजपा या वामपंथी दलों की तरह संगठनात्मक अनुशासन की कमी के चलते नेताओं के बीच आपसी लड़ाई चरम पर रहती है। उन्होंने जोर दिया कि पार्टी को आपसी कलह से ऊपर उठकर जमीनी स्तर पर काम करने की जरूरत है, वरना 2027 में सत्ता हासिल करना मुश्किल होगा। हाईकमान भले ही 2027 का चेहरा तय करे, लेकिन वरिष्ठ नेताओं में फेस की जंग पहले से ही शुरू हो चुकी है। कुछ नेता संगठन को मजबूत करने पर जोर दे रहे हैं, तो कुछ अपनी छवि चमकाने में लगे हैं। इस बीच पार्टी कार्यकर्ता और आम जनता सवाल कर रहे हैं—क्या यह आंतरिक संग्राम कांग्रेस को और कमजोर कर देगा या पंचमुखी प्रयास वाकई बदलाव ला पाएंगे? उत्तराखंड की सियासत में कांग्रेस का भविष्य फिलहाल अनिश्चित दिख रहा है। अगर दिग्गज नेता आपसी लड़ाई छोड़कर एकजुट होकर धरातल पर काम करें, तभी 2027 का सपना हकीकत बन सकता है। वरना गुटबाजी की इस जंग में पार्टी का जनाधार और भी खिसकता चला जाएगा।