पुण्यतिथि:उत्तराखंड के नैनीताल जिले की इस जगह पीपल के वृक्ष के नीचे स्वामी विवेकानंद को हुई थी आत्मज्ञान की अनुभूति, अपने ही पिंड में दिखा था ब्रह्मांड!पंतनगर यूनिवर्सिटी से वृक्ष के बचाव के लिए बुलाये गए थे वैज्ञानिक
स्वामी विवेकानंद की आज 120वीं पुण्यतिथि है।स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी सन् 1863 को कोलकाता में हुआ। उनका घर का नाम नरेंद्र दत्त था। उनके पिता श्री विश्वनाथ दत्त का निधन 1884 में में हो गया था जिसके चलते घर की आर्थिक दशा बहुत खराब हो चली थी। मात्र 39 वर्ष की उम्र में 4 जुलाई 1902 को उनका निधन हो गया।
अपनी जिज्ञासाएं शांत करने के लिए ब्रह्म समाज के अलावा कई साधु-संतों के पास भटकने के बाद अंतत: वे रामकृष्ण परमहंस की शरण में गए। रामकृष्ण के रहस्यमय व्यक्तित्व ने उन्हें प्रभावित किया, जिससे उनका जीवन बदल गया। 1881 में रामकृष्ण को उन्होंने अपना गुरु बनाया। संन्यास लेने के बाद इनका नाम विवेकानंद हुआ।

स्वामी विवेकानंद का उत्तराखंड से बेहद करीबी रिश्ता रहा है। “उत्तिष्ठ भारत” का संदेश लेकर 1890 में युगपुरुष स्वामी विवेकानंद जब हिमालय यात्रा पर निकले, तो तीन नदियों के संगम काकड़ीघाट पर उन्हें अद्भुत खगोलीय तरंगों की अनुभूति प्राप्त हुई थी| वह स्नान कर पास के एक विशाल पीपल के वृक्ष की छाया में बैठ गए। 1 घंटे तक वहां ध्यान मग्न रहते है | इसी दौरान उन्हें विश्व और अनु ब्रह्मांड एक ही नियम की संरचना का आत्मज्ञान हुआ।जिसके बारे में उन्होंने अपने संगी गुरुभाई स्वामी अखण्डानन्द के समक्ष इसका जिक्र भी किया।

छह साल बाद 1996 में स्वामी विवेकानंद अमेरिका के न्यूयोर्क में "बृहत ब्रह्मांड" व "सूक्ष्म ब्रह्मांड" विषय पर व्याख्यान देने पहुँचे थे। वन अनुसंधान के मुताबिक 19 व 26 जनवरी को उनके द्वारा विदेश में यह व्याख्यान दिए गए। उत्तराखंड के काकड़ीघाट में हुई उस दुर्लभ आध्यात्मिक अनुभूति का जिक्र स्वामी विवेकानंद ने पहली बार विश्व के समक्ष इस व्याख्यान में ही किया था।

उत्तराखंड का काकडी घाट गांव नैनीताल और अल्मोड़ा जिले के बीच बसा काकडी घाट गांव ज्ञान का केंद्र है. इसी गांव के लोग बताते है कि ये जगह ईश्वरीय शक्तियों का भंडार और सिद्ध स्थान है. बता दें कि इसी जगह पर नीम करौरी महाराज का आश्रम भी है. ऐसा कहा जाता है कि यहां पूज्य संत सोमवार गिरी महाराज ने वट वृक्ष के नीचे तपस्या की थी. ये वट वृक्ष आज भी मौजूद है. कर्कटेश्वर महादेव मंदिर में भगवान काल भैरव साक्षात विराजमान हैं, जिन्होंने स्वामी जी को साक्षात दर्शन दिए थे।

साल 2010 में आपदा के दौरान इस आध्यात्मिक पीपल वृक्ष को काफी नुकसान पहुँचा था। और यह सूखने भी लगा था। पेड़ के महत्व को देखते हुए पंतनगर यूनिवर्सिटी से वैज्ञानिक बुलाये गए और विज्ञानी विधि से एक हिस्से की कटिंग कर हल्द्वानी लाया गया। जिसके बाद रामपुर रोड स्थित वन अनुसंधान की नर्सरी में रेंजर मदन बिष्ट की देख-रेख में इसे रोपा गया। ऐतिहासिक व आध्यात्मिक महत्व का यह पेड़ अब बढ़ने लगा है। बकायदा बोर्ड के जरिये विवेकानंद व वृक्ष का संबंध भी लोगों को बताया गया है। आज जहाँ जहाँ स्वामी विवेकानंद का आश्रम है वहां इसी पीपल के वृक्ष की क्लोनिंग लगाई गई है। काकड़ीघाट में ये वृक्ष विशेष देखकर में है।