निर्वस्त्र कर पीटा,पत्रकारों ने दी थी झूठी गवाही! पिथौरागढ़ के चर्चित पूर्व एसपी लोकेश्वर सिंह-आरटीआई एक्टिविस्ट लक्ष्मी दत्त जोशी केस में कोर्ट ने दिए एफआईआर के निर्देश!
पिथौरागढ़
पूर्व SHO लोकेश्वर सिंह से जुड़ा पिथौरागढ़ का चर्चित विवाद एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) पिथौरागढ़ ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए तत्कालीन पुलिस अधिकारी लोकेश्वर सिंह समेत अन्य के खिलाफ FIR दर्ज करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि प्रथम दृष्टया मामला आपराधिक प्रतीत होता है और निष्पक्ष जांच बेहद आवश्यक है।
कोर्ट ने थाना कोतवाली पिथौरागढ़ को निर्देश दिए हैं कि तत्कालीन SHO लोकेश्वर सिंह समेत अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ IPC की धाराओं 323, 342, 355, 504, 506, 392 और 120B के तहत मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की जाए। साथ ही पुलिस अधीक्षक को भी निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।

दरअसल आरटीआई एक्टिविस्ट लक्ष्मी दत्त जोशी ने आरोप लगाया था कि सीवर लाइन से गंदा पानी उनके घर में आने की शिकायत करने पर पुलिस द्वारा उन्हें प्रताड़ित किया गया। मामले के अनुसार, 6 फरवरी 2023 को जब वे अपनी पुत्री के साथ पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचे, तो वहां मौजूद पुलिस अधिकारियों ने उन्हें जबरन कमरे में ले जाकर मारपीट की, गाली-गलौज की और फर्जी मुकदमे में फंसाने तथा एनकाउंटर की धमकी दी।आरोप था कि वहां उन्हें एक ऐसे कमरे में ले जाया गया जहां CCTV कैमरे नहीं थे और उनके साथ कथित रूप से नग्न कर मारपीट की गई। बाद में घायल अवस्था में जोशी जिला अस्पताल पहुंचे, जहां मेडिकल परीक्षण में चोटों की पुष्टि हुई।
आरोप यह भी लगे थे कि इस दौरान उनका मोबाइल फोन और लगभग 4500 रुपये छीन लिए गए और बाद में उन्हें कोतवाली ले जाकर हवालात में बंद कर दिया गया। मेडिकल जांच में चोटों की पुष्टि होने का भी उल्लेख सामने आया है।
इस प्रकरण में पीड़ित ने पहले जिला स्तर पर और फिर राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण में शिकायत दर्ज कराई थी। प्राधिकरण ने 9 दिसंबर 2025 को अपने आदेश में संबंधित पुलिस अधिकारी को दोषी मानते हुए विभागीय कार्रवाई की संस्तुति की थी, लेकिन इसके बावजूद FIR दर्ज नहीं होने पर पीड़ित को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी। इस मामले में आजतक न्यूज चैनल और न्यूज 18 के तथाकथित पत्रकारों द्वारा पुलिस अधिकारी के पक्ष में दी गई गवाही भी जांच के दौरान अविश्वसनीय पाई गई थी।
कोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी केवल औपचारिकता निभाना नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि आरोप सरकारी कर्तव्य के दायरे में नहीं आते हैं, तो धारा 197 CrPC के तहत अभियोजन स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती।
इस मामले की पृष्ठभूमि भी काफी गंभीर रही है।
राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण की जांच में तत्कालीन एसपी लोकेश्वर सिंह का पक्ष भी सामने आया था, जिसमें उन्होंने आरोपों को खारिज करते हुए शिकायतकर्ता को “अपराधिक प्रवृत्ति” का बताया था। हालांकि, प्राधिकरण ने उनके तर्कों को अविश्वसनीय मानते हुए कहा कि प्रस्तुत मेडिकल साक्ष्य आरोपों की पुष्टि करते हैं।
प्राधिकरण की पीठ, जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति एन.एस. धानिक कर रहे थे, ने भी अपने निष्कर्ष में माना था कि शिकायतकर्ता के साथ गंभीर दुर्व्यवहार हुआ, जिससे पुलिस विभाग की छवि को नुकसान पहुंचा है।
गौरतलब है कि लोकेश्वर सिंह अक्टूबर 2024 में पौड़ी में तैनाती के दौरान इस्तीफा दे चुके हैं। बाद में उनका चयन संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी एक संस्था में हुआ और केंद्र सरकार द्वारा 28 नवंबर को उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया। अब CJM कोर्ट के ताजा आदेश के बाद यह मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है।