सतर्क रहें और तैयार रहें!क्योंकि ट्रंप के फैसले से भारत को मिला बड़ा झटका, सस्ता रूसी तेल बंद होने से बढ़ेगी टेंशन,तेल संकट की आग में झुलस सकती है आम जनता
दुनिया इस समय युद्ध, महंगाई और ऊर्जा संकट के सबसे खतरनाक दौर से गुजर रही है। पश्चिम एशिया में भड़कते युद्ध, होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ते खतरे और रूस-यूक्रेन संघर्ष के बीच अब एक ऐसा फैसला सामने आया है, जिसने भारत समेत कई देशों की चिंता कई गुना बढ़ा दी है। अमेरिका ने रूसी कच्चे तेल की खरीद पर दी गई अस्थायी छूट को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया है। इसके साथ ही दुनिया पर एक नए “ऑयल शॉक” का खतरा मंडराने लगा है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने 16 मई के बाद रूसी तेल से जुड़ी उस विशेष राहत को समाप्त होने दिया, जिसके तहत पहले से लोड रूसी तेल टैंकरों से खरीद की अनुमति दी गई थी। यह फैसला ऐसे समय आया है जब भारत जैसे देश अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर सस्ते रूसी तेल पर निर्भर हो चुके हैं।
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और ईरान युद्ध ने पहले ही वैश्विक तेल सप्लाई को बुरी तरह प्रभावित कर रखा है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल गुजरता है, वहां बढ़ते खतरे ने अंतरराष्ट्रीय बाजार को हिला दिया है। इसी संकट को संभालने के लिए अमेरिका ने मार्च में पहली बार सीमित छूट दी थी ताकि पहले से भरे रूसी टैंकरों से तेल खरीदा जा सके। बाद में कई देशों के दबाव के बाद इस राहत को 16 मई तक बढ़ाया गया, लेकिन अब इस पर पूरी तरह रोक लग गई है।
भारत ने अमेरिका से इस छूट को जारी रखने की अपील भी की थी। भारतीय अधिकारियों ने साफ कहा था कि वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता का सीधा असर देश की 140 करोड़ आबादी और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। सरकार को यह डर भी था कि बढ़ती ईंधन कीमतों का सबसे बड़ा बोझ आम जनता पर पड़ेगा और रसोई गैस से लेकर रोजमर्रा की जरूरतों तक सब कुछ महंगा हो सकता है।
दरअसल पिछले कुछ महीनों में भारत ने रिकॉर्ड स्तर पर रूसी तेल की खरीद बढ़ाई थी। कमोडिटी ट्रैकिंग फर्म Kpler के अनुसार, मई के शुरुआती हफ्तों में भारत ने रूस से करीब 23 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल का आयात किया, जो अब तक का सबसे बड़ा स्तर माना गया। भारत अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस के सस्ते ‘यूराल्स ग्रेड’ तेल पर तेजी से निर्भर होता जा रहा था।
लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। खाड़ी क्षेत्र में तनाव के चलते ब्रेंट क्रूड की कीमतें 109 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच चुकी हैं। सिर्फ दो महीनों में कच्चे तेल की कीमतों में 40 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसका सीधा असर भारत के आयात बिल, वित्तीय घाटे और महंगाई पर पड़ सकता है।
स्थिति को और गंभीर बनाने वाली दूसरी बड़ी खबर रूस से आई है। यूक्रेन ने रूस के एक बड़े तेल डिपो पर हमला किया है, जिससे तेल सप्लाई नेटवर्क पर नया दबाव बन गया है।
ऐसे में अगर युद्ध और लंबा खिंचता है तो वैश्विक तेल बाजार में भारी उथल-पुथल मच सकती है।
भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा यही है कि अगर सस्ते रूसी तेल की सप्लाई बाधित हुई और अंतरराष्ट्रीय कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं, तो आने वाले महीनों में पेट्रोल-डीजल, गैस सिलेंडर, ट्रांसपोर्ट और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बड़ी आग लग सकती है। इससे महंगाई बेकाबू होने, उद्योगों की लागत बढ़ने और आम लोगों की जेब पर भारी बोझ पड़ने की आशंका है।
दुनिया जिस दिशा में बढ़ रही है, वह सिर्फ तेल संकट नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक संकट की शुरुआत भी साबित हो सकती है। भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए आने वाला समय बेहद चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।