संत, संपत्ति और साजिश- देवभूमि उत्तराखंड से रहा है गहरा नाता, अब तक 22 संतों ने गंवाई है जान, पढ़िए आवाज 24×7 की एक्सक्लुसिव रिपोर्ट
देहरादून- अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई है। जिसके बाद एक बार फिर से ये सवाल खड़ा हो गया है कि क्या संतों का मन संपत्ति में लग गया है? अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरि ने सुसाइड नोट में भी जिस विवाद का जिक्र किया है वो भी संपत्ति से जुड़ा ही बताया जा रहा है।आवाज 24×7 आपको बता रहा है कि यह कोई पहला मामला नहीं है जब किसी संत ने खुद को यूं समाप्त कर लिया हो, इससे पहले भी कई संत संपत्ति विवाद को लेकर जान दे चुके हैं।
दुनिया को मोह माया से दूर रहने का उपदेश देने वाले संत खुद मोह माया के फेर में फंस गए हैं। जिसका जीता जागता प्रमाण देवभूमि उत्तराखंड हैं। यहां मोह माया के चक्कर में दो दशकों में अब तक दो दर्जन से ज्यादा संतों की हत्या हो चुकी है। इनमें कुछ ऐसे भी हैं, जिनका आज तक कोई पता नहीं चल पाया है। इतना ही नहीं उत्तराखंड की विभिन्न अदालतों में जमीन-जायदाद पर दावों को लेकर हजार से ज्यादा मुकदमे चल रहे हैं, जो इस बात के गवाह हैं कि दूसरों को मोह माया त्यागने का संदेश देने वाले संत खुद ही इसके फेर में फंसे हैं।
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद रियल स्टेट के कारोबार में एक बड़ा क्षेत्र बनकर उभरा है। यहां क्या नेता और क्या माफिया सब प्रॉपर्टी डीलर बन गये हैं। जिसका असर अकूत जमीन, जायदाद रखने वाले साधु-संतों और यहां के अखाड़ों पर भी पड़ा। संत भी इस कारोबार में अपने हाथ आजमाने से नहीं चुके। यही कारण रहा की कभी भद्र लोगों के लिए बने आश्रमों में माफियाओं और प्रॉपर्टी डीलरों की आवाजाही शुरू हो गई।जिसका परिणाम कुछ यूं हुआ की दो दर्जन से ज्यादा संतों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। इस दौरान तमाम आश्रमों के अलावा मठों और मंदिरों की जमीनें न केवल बेची गई। बल्कि उन पर कई मंजिला अपॉर्टमेंट भी बन गए हैं। जिससे होने वाले फायदे के फेर में संत एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए।
लगातार हो रही संतों की हत्या के क्रम में रामदेव के आश्रम के पास अकूत संपदा के मालिक महंत सुधीर गिरि की हत्या के बाद से एक बार फिर देवभूमि में संतों के माफिया से मजबूत होते जा रहे गठबंधन पर सवाल उठने लगे थे। इस संत की हत्या के बाद पुलिस ने एक साल बाद हरिद्वार के ही दो बड़े प्रॉपर्टी डीलरों की गिरफ्तार किया था.इस हत्या में भी एक बड़े संत का हाथ बताया जा रहा था। लेकिन बाद में उस संत ने अपने रसूख और सरकार की नजदीकियों का फायदा उठाते हुए खुद को इससे बाहर निकाला. वैसे भी संतों की हत्याओं के अधिकांश मामलों को पुलिस ठंडे बस्ते में ही डाल देती है।
एक अरसे से इस सब पर निगाह रखे बुद्धिजीवी भी मानते हैं कि सुधीर गिरि ही नहीं बल्कि उनके जैसे दर्जनों संत संपत्ति के लालच और हरिद्वार में लगातार बढ़ती जा रही फ़्लैट संस्कृति के चलते अपनी जान गंवा चुके हैं। कई वरिष्ठ पत्रकार मानते हैं कि उत्तराखंड बनने के बाद जिस तरह से धर्मनगरी हरिद्वार में संतों और अखाड़ों में फ़्लैट संस्कृति का चलन बढ़ा है। उसी की वजह से लगातार संतों की हत्याएं हो रही हैं।
राह भटक गये संत-
सिर्फ अपने प्रवचनों मात्र से ही किसी भी राह भटक चुके व्यक्ति को रास्ते पर ले आने वाले संत खुद रास्ता भटक गए हैं। दरअसल, बदलते समय के साथ जंगल की कुटिया छोड़ कर फाइव स्टार आश्रमों में आ बैठे संत मोह माया के जाल में कुछ यूं फंस गए हैं कि इस मकड़जाल से बाहर निकलने की जगह इस भंवर में फंसते ही जा रहे हैं। दान में मिली जमीन जायदाद को बेच कर आलिशान आश्रम बनाने के चक्कर में संत समाज का एक तबका ऐसा फंसा कि पूरे संत समाज की जान पर बन आई है।देव भूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड में अब तक 24 से ज्यादा संत साजिशों का शिकार हो चुके हैं। अधिकांश मामलो में ये साजिश माफियाओं के साथ मिलकर की गई है। एक-दो मामलो को छोड़कर किसी भी मामले का पुलिस खुलासा नहीं कर पाई है। कुछ मामले तो ऐसे भी रहे जिनमें कुछ पुलिस अधिकारी भी शक के दायरे में आए।
कुछ समय पहले तक तो माफिया की पहचान आसानी से की जा सकती थी, मगर बदलते हालात में माफियाओं ने अपने काम करने का तरीका भी बदल दिया है। अब अक्सर विवादित आश्रमों और अखाड़ों में माफिया सोची समझी रणनीति के तहत अपने कुछ गुर्गो को भगवा वस्त्र की आड़ में प्रवेश करवा देता हैं। जिनकी शिनाख्त कर पाना पुलिस के लिए मुश्किल है। इसी बात का फायदा उठा कर अक्सर माफिया अपने मंसूबो में कामयाब हो जाता हैं। हालात अब इस कदर खराब हो चले हैं कि संत तो संत पुलिस तक हालात को संभाल पाने में असमर्थ है।
ऐसे शुरू हुआ हत्याओं का सिलसिला-
1- सनसनीखेज हत्याकांडों की कड़ी 1991 से शुरू होती है। 25 अक्टूबर 1991 को रामायण सत्संग भवन के संत राघवाचार्य आश्रम से निकलकर टहल रहे थे। स्कूटर सवार लोगों ने उन्हें घेर लिया। पहले गोली मारी फिर चाकूओं से गोद दिया। 09 दिसम्बर 1993 को रामायण सत्संग भवन के ही संत राघवाचार्य आश्रम के साथी रंगाचार्य की ज्वालापुर में हत्या कर दी गई। अब सत्संग भवन में सरकारी पहरा है। उस पर रिसीवर तैनात है।
सुखी नदी स्थित मोक्षधाम की करोड़ों की सम्पत्ति-
2- 1 फरवरी 2000 को ट्रस्ट के सदस्य गिरीश चंद अपने साथी रमेश के साथ अदालत जा रहे थे। तभी पीछे से एक जीप ने टक्कर मारी। जिसमें रमेश मारे गये। पुलिस ने स्वामी नागेन्द्र ब्रह्मचारी को सूत्रधार मानते हुए जेल भेज दिया।
3- बेशकीमती कमलदास की कुटिया पर भी लोगों की दृष्टि रही। झगड़े हुए वहां कोई हत्या तो नहीं हुई परन्तु पुलिस का पहरा बरकरार है। चेतनदास कुटिया में तो अमेरिकी साध्वी प्रेमानंद की दिसंबर 2000 में लूटपाट के बाद हत्या कर दी गई। कुछ स्थानीय लोग पकड़े गये मामला चल रहा है। 5 अप्रैल 2001 को बाबा सुतेन्द्र बंगाली की हत्या की गई।
4- 6 जून 2001 को हरकी पैड़ी के सामने टापू में बाबा विष्णुगिरि समेत चार साधुओं की हत्या। 26 जून 2001 को ही एक अन्य बाबा ब्रह्मानंद की हत्या। इसी वर्ष पानप देव कुटिया के बाबा ब्रह्मदास को दिनदहाड़े गोली से उड़ा दिया गया। 17 अगस्त 2002 बाबा हरियानंद व उनके चेले की हत्या। एक अन्य संत नरेन्द्र दास की हत्या की गई।
5- 06 अगस्त 2003 को संगमपुरी आश्रम के प्रख्यात संत प्रेमानंद उर्फ भोले बाबा गायब। 07 सितंबर 2003 को हत्या का खुलासा। आरोपी गोपाल शर्मा पकड़ा गया, अब आश्रम सील है।
6- 28 दिसम्बर 2004 को संत योगानंद की हत्या। हत्यारों का आज तक पता नहीं चला।
7- 15 मई 2006 को पीली कोठी के स्वामी अमृतानंद की हत्या। संपत्ति पर सरकारी कब्जा।
8- 25 नवंबर 2006 को सुबह इंडिया टैम्पल के बाल स्वामी की गोली मारकर हत्या। तीन हत्यारे गिरफ्तार साजिश के तार अयोध्या से जुड़े।
9- 08 फरवरी 2008 को निरंजनी अखाड़े के 7 साधुओं को दिया गया जहर। सभी बच गए। लेकिन कोई पकड़ा नहीं गया।
10- 14 अप्रैल 2012 निर्वाणी अखाड़े के सर्वोच पद पर असिन महंत सुधीर गिरि की हत्या हुई।
11- 26 जून 2012 तिहरे हत्या कांड से पूरे हरिद्वार सहित उत्तराखंड प्रशासन को हिलाकर रख दिया। हरिद्वार के लक्सर में हनुमान मंदिर में देर रात तीन संतों के ऊपर हमला हुआ। जिसमें तीनों की मौत हो गयी। पुलिस इस मामले को भी सम्पति विवाद बता रही है।
छोटी बड़ी वारदातों में 22 से ज्यादा संत मारे गए। इस पर संत भी मानते हैं कि अब जिस तरह से संतों में भी विलासिता का समावेश हो रहा है वो खतरनाक है। पुलिस भी साधु-संन्यासियों की हत्या के पीछे माया को वजह मानती है। साथ ही वह सभी मामलों को सुलझाने का दावा भी करती है। लेकिन अब तक पुलिस किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है।
हत्या पर हत्या- हरिद्वार में सालों से संतों की हत्या जमीनों को लेकर होती आई है। ऐसा पहली बार हुआ है जब दो महीने में ही माफियाओं ने चार संतों को मौत के घाट उतार दिया था। सन 2014 में महानिर्वाणी अखाड़े के सर्वोच्च पद पर आसीन महंत सुधीर गिरि की हत्या के पीछे भूमाफियाओं के हाथ होने की आंशका जताई जा रही थी। महंत सुधीर गिरि के गुरू विनोद गिरि ने भी आंशका जताई थी कि हत्या में किसी खास नजदीकी व्यक्ति का हाथ है।
हत्यारे तब से 15 अप्रैल की रात तक महंत का पीछा कर रहे थे। जैसे ही वो अपने आश्रम के नजदीक पहुंचे वैसे ही उनको गोलियों से भून दिया गया। पुलिस अधिकारी भी हत्या के पीछे संपत्ति विवाद को वजह मान कर जांच कर रहे हैं। पुलिस अधीक्षक देहात रोशनलाल शर्मा का कहना है कि अभी तक जो जानकारी सामने आई है उसके महंत सुधीर गिरि अखाड़े की सारी संपत्ति देखरेख किया करते थे। अखाड़े की संपति की पैरवी आदि भी वही किया करते थे।
अभी सुधीर गिरि हत्याकांड का खुलासा हुआ भी नहीं था कि हरिद्वार के ही लक्सर से तीन संतों की हत्या की खबर ने उत्तराखंड सरकार को हिला कर रख दिया. रुड़की के डोसनी के हनुमान मंदिर में 27 जून की देर रात तीन साधुओं पर अज्ञात बदमाशों ने धारदार हथियारों से ताबड़तोड़ हमले किये। जिसके चलते तीनों साधुओं ने दम तोड़ दिया हनुमान मंदिर में हुए संतों के तिहरे हत्याकांड में भी सपंत्ति विवाद सामने आया।
लगातार हो रही संतों की हत्या से जहां उत्तराखंड में पुलिस प्रशासन परेशान है, वहीं उत्तराखंड सरकार भी चिंतित थी। तत्कालीन कैबिनेट मंत्री इंदिरा हृदयेश ने भी लगातार हो रही संतों के हत्या मामले में चिंता जाहिर की थी।