न संवैधानिक पद, न सरकारी जिम्मेदारी,फिर भी कथावाचक धीरेंद्र शास्त्री को दिया गया गार्ड ऑफ ऑनर!सोशल मीडिया में लोगो ने दिए तीखे रिएक्शन
मैहर। संविधान और नियमों की दुहाई देने वाली व्यवस्था को लेकर एक नया सवाल खड़ा हो गया है। मध्य प्रदेश के मैहर में बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। खास बात यह है कि शास्त्री किसी संवैधानिक पद पर नहीं हैं, बल्कि कथावाचक हैं। इसके बावजूद उन्हें पुलिस के औपचारिक सम्मान से नवाजा गया। इस दौरान मैहर के पुलिस अधीक्षक अवधेश प्रताप सिंह भी मौजूद रहे।

धीरेंद्र शास्त्री के मैहर दौरे के दौरान KJS सीमेंट परिसर में उनका स्वागत किया गया। इसके बाद वह आवासीय परिसर में पुलिस अधीक्षक अवधेश प्रताप सिंह के साथ क्रिकेट खेलते भी नजर आए। खेल शुरू होने से पहले एसपी ने शास्त्री का आशीर्वाद लिया। इसी दौरान उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया।

बता दें कि गार्ड ऑफ ऑनर सामान्य स्वागत की रस्म नहीं है। यह निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत दिया जाने वाला औपचारिक सम्मान है,जिसके लिए निर्धारित नियम और प्रक्रियाएं हैं। सेना, नौसेना, वायुसेना,संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों और पुलिस के लिए लागू नियम अलग-अलग हो सकते हैं। यह सम्मान भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों, विदेशी राष्ट्राध्यक्षों और सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को उनकी आधिकारिक यात्राओं या विशेष समारोहों के दौरान दिया जाता है। इसके अलावा कर्तव्य निभाते हुए शहीद होने वाले जवानों को यह सम्मान दिया जाता है। लेकिन किसी व्यक्ति की धार्मिक प्रतिष्ठा या लोकप्रियता मात्र से उसे इस सम्मान का स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता।
भारतीय प्रोटोकॉल के अनुसार, निजी व्यक्तियों चाहे उनका धार्मिक, आध्यात्मिक या सामाजिक प्रभाव कितना भी बड़ा क्यों न हो, वे गार्ड ऑफ ऑनर के हकदार नहीं होते हैं। इसमें धार्मिक उपदेशक, बाबा, कथावाचक, संत या सामाजिक कार्यकर्ता शामिल नहीं हैं ऐसे में धीरेंद्र शास्त्री को गार्ड ऑफ ऑनर देने का निर्णय किस आधार पर लिया गया? क्या इसके लिए कोई लिखित आदेश जारी हुआ था? क्या संबंधित नियमों के तहत वह इस सम्मान के पात्र थे? और यदि विशेष अनुमति दी गई थी, तो वह किस सक्षम अधिकारी ने दी?धार्मिक आस्था और सरकारी प्रोटोकॉल दो अलग विषय हैं।
किसी कथावाचक के प्रति श्रद्धा व्यक्तिगत मामला हो सकता है, लेकिन सरकारी वर्दी और औपचारिक सम्मान सार्वजनिक व्यवस्था का हिस्सा हैं।संविधान क्या सिर्फ आम आदमी को नियमों का पाठ पढ़ाने के लिए है? अगर किसी कथावाचक को गार्ड ऑफ ऑनर देने के लिए नियमों की जरूरत नहीं, तो फिर सरकारी प्रोटोकॉल की किताबें किसलिए हैं?