नैनीताल:पहाड़ की परंपरा, मायके का स्नेह, पाषाण देवी मंदिर में 111 विवाहित महिलाओं को दी ‘भिटोली’,उत्तराखंड की संस्कृति का दिखा रंग

Nainital: Upholding the traditions of the hills and the affection of one's maternal home, 111 married women were presented with 'Bhitoli' at the Pashan Devi Temple—a vibrant display of Uttarakhand's

उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति और पारंपरिक रीति-रिवाजों की एक अनूठी झलक नैनीताल में देखने को मिली, जहां पाषाण देवी मंदिर में 111 विवाहित महिलाओं को ‘भिटोली’ भेंट की गई। यह आयोजन केवल एक रस्म नहीं, बल्कि पहाड़ की भावनाओं, रिश्तों और सामाजिक जुड़ाव का सजीव उदाहरण बनकर सामने आया।


मंदिर के पुजारी पंडित जगदीश चन्द्र भट्ट के अनुसार, उत्तराखंड में चैत महीने का विशेष महत्व होता है। जैसे ही यह महीना शुरू होता है, विवाहित बेटियों और बहनों को अपने मायके से आने वाली ‘भिटोली’ का बेसब्री से इंतजार रहता है। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, जिसमें मायका अपनी बेटी के लिए उपहार, मिठाई, कपड़े और स्नेह भेजता है।


नैनीताल के पाषाण देवी मंदिर में बीते वर्ष से इस परंपरा को सामूहिक रूप से निभाने की पहल की गई है। इस वर्ष भी 111 विवाहित बहनों को ‘भिटोली’ देकर न केवल इस परंपरा को जीवित रखा गया, बल्कि समाज में इसके महत्व को भी पुनः स्थापित किया गया।


बता दें कि‘भिटोली’ उत्तराखंड का एक प्रमुख लोकपर्व माना जाता है, हालांकि यह पारंपरिक अर्थों में त्योहार नहीं, बल्कि एक सामाजिक और भावनात्मक परंपरा है। यह रिवाज उस गहरे रिश्ते को दर्शाता है, जो एक बेटी और उसके मायके के बीच जीवनभर बना रहता है, चाहे वह विवाह के बाद कहीं भी क्यों न चली जाए।
पहाड़ों में जहां भौगोलिक दूरी और कठिन जीवनशैली के कारण रिश्तों को निभाना चुनौतीपूर्ण होता है, वहां ‘भिटोली’ जैसे रिवाज रिश्तों को मजबूती देने का काम करते हैं। यह केवल उपहार देने की परंपरा नहीं, बल्कि बेटी को यह एहसास दिलाने का माध्यम है कि उसका मायका हमेशा उसके साथ है।
आज के आधुनिक दौर में जहां पारंपरिक रिवाज धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं, ऐसे आयोजनों के माध्यम से उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का प्रयास सराहनीय है। नैनीताल में आयोजित यह कार्यक्रम न केवल स्थानीय लोगों के लिए, बल्कि नई पीढ़ी के लिए भी अपनी जड़ों से जुड़ने का एक प्रेरणादायक उदाहरण बन गया है। भिटोली की यह परंपरा हमें यह सिखाती है कि रिश्तों की असली मजबूती केवल शब्दों में नहीं, बल्कि उन भावनाओं में होती है, जिन्हें पीढ़ियों से सहेजकर आगे बढ़ाया जाता है।

इस कार्यक्रम में पंडित जगदीश चंद्र भट्ट,प्रगति जैन,वर्षा आर्या, इत्यादि लोग शामिल रहे।