नैनीताल:निचली अदालत से मिली उम्रकैद,हाईकोर्ट से बरी,फिर सुप्रीम कोर्ट की दखल,दोबारा सुनवाई में 47,500 रुपये की लूट के लिए हत्या के चारों आरोपी फिर बरी!
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 2003 में हल्द्वानी में हुए हत्या और लूट के करीब 21 साल पुराने मामले में चारों आरोपियों को बरी कर दिया है। मामले में निचली अदालत ने दो आरोपियों को हत्या और साक्ष्य मिटाने के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, जबकि दो अन्य आरोपियों को भी अलग-अलग धाराओं में सजा दी गई थी। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां से दोबारा सुनवाई के लिए हाईकोर्ट भेजे जाने के बाद अब खंडपीठ ने पुलिस की जांच और अभियोजन की कहानी का बारीकी से परीक्षण करते हुए आरोपियों को संदेह का लाभ दिया है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने अभियोजन की कहानी से जुड़ा एक अहम सवाल सामने आया। अभियोजन के मुताबिक हत्या और लूट की वारदात 47 हजार 500 रुपये की रकम के लिए की गई थी, लेकिन अदालत ने इस बात पर गौर किया कि यदि यही रकम लूट का मकसद थी, तो आखिर वह रकम बरामद कहां हुई? अदालत के समक्ष आरोपियों से इस रकम की कोई बरामदगी साबित नहीं हो सकी।
दरअसल, वर्ष 2003 में हल्द्वानी में मुरादाबाद के एक कैसेट व्यापारी के कर्मचारी राज की हत्या कर दी गई थी। उसका शव नहर में मिला था। आरोप था कि उसके साथ मौजूद व्यक्ति को घायल कर 47 हजार 500 रुपये और कैसेट लूट लिए गए थे। अभियोजन के मुताबिक, वारदात के दौरान मुख्य गवाह को भी नहर में फेंक दिया गया था।
मुख्य गवाह ने अपने बयान में बताया था कि जब अनिल उसकी गर्दन पर चाकू से वार करने वाला था, तभी उसे होश आया और उसने शोर मचाना शुरू कर दिया। इसी दौरान मौके पर पहुंचे पुलिस कांस्टेबल कनई सिंह ने उसे नहर से बाहर निकाला।
घटना के बाद कोतवाली में मुकदमा दर्ज किया गया और पुलिस ने अनिल, इमरान, वासिब और पप्पू को गिरफ्तार किया। मामला अदालत पहुंचा तो जिला अदालत ने अनिल और इमरान को हत्या तथा साक्ष्य मिटाने के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई, जबकि वासिब और पप्पू को भी दोषी ठहराते हुए एक वर्ष की सजा सुनाई गई।
इसके बाद आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। वर्ष 2013 में हाईकोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। हालांकि, राज्य सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए हाईकोर्ट भेज दिया।
दोबारा सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने पुलिस की जांच, अभियोजन के साक्ष्यों और पूरी कहानी का परीक्षण किया। अदालत ने विशेष रूप से कथित तौर पर लूटी गई 47,500 रुपये की रकम की बरामदगी के सवाल को अहम माना। पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्यों के अभाव में हाईकोर्ट ने चारों आरोपियों को बरी कर दिया।