नैनीताल: कभी पूरे भारत में था नाम, आज वीरान पड़ा रैमजे अस्पताल, आज एक नर्स के भरोसे, गिरीश रंजन तिवारी के आवास में सम्मान समारोह से उठी पुनर्जीवन की मांग, सांसद अजय भट्ट ने जताई चिंता

Nainital: Once renowned across India, Ramsay Hospital now lies desolate and relies on a single nurse; a call for its revival has emerged from a felicitation ceremony held at Girish Ranjan Tiwari's re

नैनीताल।

उत्तराखंड की पर्यटन राजधानी नैनीताल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए जानी जाती है, लेकिन इन्हीं धरोहरों में शामिल एक नाम आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। ब्रिटिश काल में स्थापित रैमजे अस्पताल, जिसे बाद में जीबी पंत अस्पताल के रूप में भी जाना गया, कभी पूरे कुमाऊं मंडल ही नहीं बल्कि देशभर के मरीजों के लिए भरोसे का केंद्र हुआ करता था। आज वही अस्पताल सरकारी उपेक्षा, संसाधनों की कमी और स्वास्थ्य तंत्र की असफलताओं का प्रतीक बनता जा रहा है।

शुक्रवार को नैनीताल स्थित वरिष्ठ पत्रकार डॉक्टर गिरीश रंजन तिवारी को पत्रकारिता एवं शिक्षा के क्षेत्र में किए गए उत्कृष्ट कार्यों के लिए सम्मानित करने उनके आवास पहुंचे सांसद अजय भट्ट ने मौके पर उपस्थित तमाम बुद्धिजीवीगणों से शहर के ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा की। इस दौरान शहर के एकमात्र जिला अस्पताल बीडी पांडे में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली एवं ब्रिटिश कालीन (रैम जे) जीबी पंत अस्पताल की दुर्दशा पर चिंता व्यक्त की।  


उन्होंने प्रो गिरीश रंजन तिवारी के आवास से स्वयं रैम जे जाकर अस्पताल का निरीक्षण किया तो जो तस्वीर सामने आई उसने वर्षों से उठ रहे सवालों को और गहरा कर दिया। अस्पताल परिसर लगभग सुनसान मिला। सांसद के अनुसार निरीक्षण के दौरान एक नर्स को छोड़कर न तो कोई चिकित्सकीय स्टाफ मौजूद था और न ही कोई वरिष्ठ अधिकारी। अस्पताल के वार्डों में बेड तो लगे थे, लेकिन मरीज नहीं थे।

कभी देशभर में था रैमजे का नाम


ब्रिटिश शासनकाल में स्थापित रैमजे अस्पताल को पहाड़ों के सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा संस्थानों में गिना जाता था। उस दौर में आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं सीमित थीं, लेकिन रैमजे अस्पताल अपने अनुभवी सर्जनों और चिकित्सकों के कारण दूर-दराज के क्षेत्रों में प्रसिद्ध था। कुमाऊं, गढ़वाल ही नहीं बल्कि देश के अन्य हिस्सों से भी लोग यहां इलाज कराने पहुंचते थे। कई नामी सर्जनों की ख्याति इतनी थी कि मरीज विशेष रूप से उन्हीं से ऑपरेशन कराने आते थे। नैनीताल के बुजुर्ग आज भी उस दौर को याद करते हैं जब यह अस्पताल पूरे पर्वतीय क्षेत्र के लिए जीवनदायिनी संस्था माना जाता था।

आज फिल्मों की शूटिंग का केंद्र, मरीजों का नहीं
समय के साथ अस्पताल की स्थिति लगातार बिगड़ती चली गई। जिस भवन में कभी मरीजों की आवाजाही रहती थी, वहां अब अक्सर फिल्मों और वेब सीरीज की शूटिंग होती दिखाई देती है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि अस्पताल की ऐतिहासिक इमारत का उपयोग चिकित्सा सेवाओं से ज्यादा शूटिंग के लिए होने लगा है।
वर्तमान में अस्पताल में केवल पांच नर्सें और दो फार्मासिस्ट ही तैनात बताए जाते हैं। विशेषज्ञ चिकित्सकों और पर्याप्त स्टाफ की कमी के कारण यहां स्वास्थ्य सेवाएं लगभग नाममात्र की रह गई हैं।

हंस फाउंडेशन के भरोसे डायलिसिस सेवा
विडंबना यह है कि अस्पताल में जो सबसे महत्वपूर्ण चिकित्सा सुविधा संचालित हो रही है, वह भी सरकारी तंत्र नहीं बल्कि हंस फाउंडेशन के सहयोग से चल रही है। अस्पताल के एक हिस्से में मरीजों के लिए डायलिसिस सुविधा उपलब्ध कराई गई है, जिसका संचालन, उपकरण और चिकित्सक तक हंस फाउंडेशन द्वारा उपलब्ध कराए गए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि गैर-सरकारी संस्थाएं आगे न आएं तो अस्पताल में मरीजों के लिए बची हुई सुविधाएं भी समाप्त हो सकती हैं।

बीडी पांडे अस्पताल पर बढ़ता दबाव
रैमजे अस्पताल की बदहाली का सीधा असर नैनीताल के बीडी पांडे अस्पताल पर दिखाई देता है। पूरे जिले के मरीजों का दबाव अब लगभग एकमात्र बड़े सरकारी अस्पताल पर आ गया है। स्थिति यह है कि महिला और पुरुष दोनों विभागों के लिए अल्ट्रासाउंड की सीमित सुविधा उपलब्ध है। कई मरीजों को जांच के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। गंभीर मामलों में भी लोगों को दो-दो और तीन-तीन दिन बाद की तारीख मिलने की शिकायतें सामने आती रहती हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी और बढ़ती मरीज संख्या के कारण स्वास्थ्य सेवाओं पर लगातार दबाव बढ़ रहा है।

सांसद अजय भट्ट ने जताई चिंता
निरीक्षण के बाद सांसद अजय भट्ट ने अस्पताल की स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यह अस्पताल कभी पूरे कुमाऊं क्षेत्र के लिए वरदान था। यहां ऐसे-ऐसे सर्जन रहे जिनके नाम पर लोग दूर-दूर से आते थे, लेकिन आज वही अस्पताल धूल फांक रहा है। सांसद ने कहा कि अस्पताल में बेड तो मौजूद हैं, लेकिन मरीज नहीं हैं। उन्होंने यह भी बताया कि पहले यहां रोटेशन के आधार पर चिकित्सकों की व्यवस्था की गई थी, लेकिन उससे अपेक्षित परिणाम नहीं मिले क्योंकि मरीजों को हर बार अलग-अलग डॉक्टर मिलते थे। उन्होंने बताया कि इस संबंध में उन्होंने प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री और स्वास्थ्य विभाग की महानिदेशक से बातचीत की है तथा अस्पताल को पुनर्जीवित करने के लिए नए सिरे से प्रयास किए जाएंगे।

क्या बच पाएगी नैनीताल की यह विरासत?
रैमजे अस्पताल केवल एक स्वास्थ्य केंद्र नहीं, बल्कि नैनीताल की ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा है। सवाल यह है कि क्या सरकार इस विरासत को फिर से जीवित कर पाएगी, या फिर यह इमारत धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमट जाएगी। स्थानीय बुद्धिजीवी, सामाजिक संगठन और नागरिक लंबे समय से इसकी पुनर्बहाली की मांग कर रहे हैं। सांसद के हालिया निरीक्षण ने एक बार फिर उम्मीद जगाई है कि शायद आने वाले समय में यह अस्पताल अपने पुराने गौरव का कुछ हिस्सा वापस हासिल कर सके। लेकिन फिलहाल हकीकत यही है कि जहां कभी मरीजों की कतारें लगती थीं, वहां आज सन्नाटा पसरा हुआ है।