नैनीताल:टाइम बम पर नैनीताल!1880 की तबाही के मुकाबले भविष्य में कई गुना ज्यादा हो सकता है जान-माल का नुकसान!
नैनीताल सिर्फ एक पर्यटन नगरी नहीं, बल्कि बेहद संवेदनशील पहाड़ियों पर बसा एक ऐतिहासिक शहर है। लेकिन जिस प्राकृतिक संतुलन ने नैनीताल को खूबसूरती दी, उसी संतुलन के लगातार बिगड़ने ने अब इसके भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

18 सितंबर 1880 को नैनीताल ने एक ऐसी विनाशकारी त्रासदी देखी थी, जिसे आज भी शहर के इतिहास का सबसे भयावह भूस्खलन माना जाता है। उस दौरान भारी भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई और 151 लोगों की जान चली गई। उस समय नैनीताल की आबादी और निर्माण आज की तुलना में बेहद कम था। बावजूद इसके, प्रकृति के उस कहर ने पूरे शहर को हिला दिया था।

आज करीब डेढ़ सदी बाद नैनीताल की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। पहाड़ों को काटकर सड़कें बनाई गईं, प्राकृतिक ढलानों पर कंक्रीट के मकान और बहुमंजिला भवन खड़े होते गए। कई मकान तो केवल बोरे और कट्टों के सहारे टिके है।

शहर का विस्तार लगातार बढ़ा, आबादी बढ़ी और पर्यटन के दबाव ने यहां वाहनों, होटल और व्यावसायिक निर्माण का बोझ भी बढ़ा दिया। सवाल यह है कि जिस पहाड़ ने 1880 में सीमित आबादी और सीमित निर्माण के बावजूद इतनी बड़ी तबाही देखी, वह आज के इस बढ़े हुए बोझ को कब तक सह पाएगा?

नैनीताल के आसपास के कई इलाके पहले से ही भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील माने जाते हैं। बलियानाला जैसे क्षेत्रों में लगातार होने वाली भू-गतिविधियां इस खतरे की गंभीरता को सामने लाती रही हैं। समय-समय पर भू-वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने भी पहाड़ी ढलानों से छेड़छाड़, अनियंत्रित निर्माण, जल निकासी की समस्या और बदलते मौसम के बीच बढ़ते भूस्खलन के खतरे को लेकर चेताया है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर भविष्य में नैनीताल में 1880 से भी अधिक बड़ा भूस्खलन हुआ, तो नुकसान केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेगा। आज संवेदनशील ढलानों पर बड़ी संख्या में मकान, होटल, सड़कें और अन्य निर्माण मौजूद हैं। ऊपरी पहाड़ियों में हुए भारी निर्माण के कारण फूट हिल लगातार खिसक रहा है। जिसका बड़ा असर मॉल रोड में लगातार बढ़ रही दरारें किसी से छिपी नहीं है।
2018 में क्षतिग्रस्त हुई मॉल रोड

केवल मॉल रोड ही नहीं डीएसबी कॉलेज को जाने वाली सड़क में भी दरारे अक्सर आती हैं,उधर बिड़ला रोड में भी जहां तहां सड़कों पर दरारें पड़ी हुई हैं यहां तक कि ऊपरी क्षेत्र के कई मकानों में भी अब दरारें स्पष्ट रूप से दिखनी लगी है,जो एक बड़ी चिंता का विषय है।
हाल ही में राष्ट्रीय समाचार पत्र अमर उजाला में छपी एक खबर के अनुसार हालिया डिजिटल मैपिंग और जीआईएस आधारित अध्ययन में नैनीताल के भू-भाग को लेकर गंभीर संकेत सामने आने की बात कही गई है। अध्ययन के मुताबिक शहर का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा खतरे वाले क्षेत्र की जद में माना गया है। कई संवेदनशील ढलानों पर जमीन के धीरे-धीरे खिसकने के संकेत मिल रहे हैं। यह बदलाव हमेशा आंखों से दिखाई नहीं देता, लेकिन भूगर्भीय स्तर पर होने वाली ऐसी धीमी हलचल भविष्य में बड़े भूस्खलन का कारण बन सकती है।
शहर में स्थानीय आबादी के साथ पर्यटन सीजन में हजारों पर्यटकों की मौजूदगी रहती है। ऐसे में किसी बड़े भूस्खलन की स्थिति में जनहानि और आर्थिक नुकसान का दायरा 1880 की त्रासदी से कहीं अधिक हो सकता है।

1880 नैनीताल के इतिहास की एक भयावह चेतावनी थी। आज विज्ञान और तकनीक हमारे पास पहले से कहीं अधिक है। ऐसे में अगली चेतावनी को नजरअंदाज करना शायद सबसे बड़ी भूल होगी। क्योंकि पहाड़ जब अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे खिसकने लगते हैं, तो वे अक्सर आने वाली बड़ी आपदा का संकेत दे रहे होते हैं। नैनीताल को बचाने के लिए फैसला आपदा के बाद नहीं, आपदा से पहले लेना होगा।
नैनीताल को बचाने का फैसला आज लेना होगा,क्योंकि आपदा आने के बाद की गई तैयारी अक्सर सिर्फ आंकड़े दिखाती है, जिंदगियां नहीं बचाती।