नैनीताल:हाईकोर्ट के निर्देशों की अनदेखी? NGT के नियमों का उल्लंघन! नैनी झील किनारे उगे छह कंक्रीट हट्स, पुनीत टंडन ने उठाई आवाज,बोले – क्या नैनीताल की प्राकृतिक विरासत हो रही है नीलाम?
नैनीताल। जिस शहर की पहचान कभी देवदार, पहाड़, हरियाली और निर्मल झीलों से होती थी, वहां अब विकास के नाम पर कंक्रीट की एक नई संस्कृति आकार लेती दिखाई दे रही है। नैनीताल झील के किनारे एक ओर बात हाउस क्लब के ठीक सामने हरे भरे पार्क को उजाड़ कर स्मारक स्थल बनाया जा रहा है तो वही दूसरी ओर झील के किनारे निर्मित छह कंक्रीट हट्स ने एक बार फिर इस बहस को हवा दे दी है कि आखिर पर्यटन नगरी का संरक्षण किया जा रहा है या उसकी प्राकृतिक आत्मा को धीरे-धीरे खत्म किया जा रहा है।
माँ नयना देवी नैनीताल व्यापार मंडल के अध्यक्ष पुनीत टंडन ने झील से सटी इन संरचनाओं पर गंभीर आपत्ति जताते हुए सवाल उठाया है कि क्या नैनीताल अब पर्यावरणीय संवेदनशील क्षेत्र नहीं, बल्कि प्रयोगशाला बन चुका है, जहां हर कुछ वर्षों में कोई नया कंक्रीट मॉडल उतार दिया जाता है और फिर उसे सौंदर्यीकरण का नाम दे दिया जाता है।
जारी प्रेस विज्ञप्ति में टंडन ने आरोप लगाया है कि झील किनारे बने कुछ हट्स ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे सीधे झील के ऊपर खड़े कर दिए गए हों। उनका कहना है कि निर्माण कार्य के दौरान हुई कटान और मलबा झील तक पहुंचा, जिससे झील में गाद जमने का खतरा बढ़ गया है। विशेष रूप से लाइब्रेरी क्षेत्र के समीप बने एक हट को लेकर उन्होंने चिंता जताई कि इसका प्रभाव झील के जलग्रहण क्षेत्र पर पड़ सकता है।
पुनीत टंडन ने कहा कि बोट हाउस क्लब के सामने प्रस्तावित कंक्रीटीकरण का विरोध पहले से जारी है, लेकिन अब इन छह कंक्रीट हट्स ने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि झील के इतने निकट निर्माण कार्य हुए हैं तो क्या इनके लिए पर्यावरणीय अनुमति ली गई? क्या मास्टर प्लान के प्रावधानों का पालन हुआ? और सबसे अहम, क्या उत्तराखंड हाईकोर्ट के निर्देशों को दरकिनार कर निर्माण किया गया?
बता दें कि पूर्व में उत्तराखंड हाईकोर्ट पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए राज्य की नदियों, नालों, झीलों और गधेरों के किनारों पर अवैध अतिक्रमण को हटाने और निर्माण पर रोक लगाने के कड़े निर्देश दे चुका है। अक्सर जलस्रोतों के किनारों से 100 से 300 मीटर के दायरे को सुरक्षित ज़ोन/बाढ़ क्षेत्र (Flood plain) माना जाता है। कोर्ट ने जल निकायों के कैचमेंट क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों को पारिस्थितिकी के लिए गंभीर खतरा मानते हुए सख्त रुख अपनाया था। सुखाताल सहित अन्य पुनर्भरण क्षेत्रों को लेकर भी न्यायालय कई बार सरकार और प्रशासन को चेतावनी दे चुका है कि अनियोजित कंक्रीटीकरण अंततः जल स्रोतों के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा करेगा। अवैध निर्माण को रोकने के लिए नदियों और जलस्रोतों के किनारों पर सीसीटीवी कैमरे लगाने और उनकी सख्त मॉनिटरिंग करने के भी आदेश जारी हुए थे।
वही राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के दिशा-निर्देशों के अनुसार, पहाड़ी इलाकों में नदियों के किनारों से 100 मीटर तक का दायरा प्रतिबंधित क्षेत्र माना जाता है, जबकि 100 से 300 मीटर का दायरा नियामक क्षेत्र (Regulatory zone) के रूप में आता है।
लेकिन विडंबना यह है कि हाईकोर्ट इसी शहर नैनीताल में स्थित है और उसकी नाक के नीचे ही शहर को तबाह किया जा रहा है। एक ओर मंचों से झील संरक्षण, हरित विकास और सतत पर्यटन की बातें की जाती हैं, वहीं दूसरी ओर झील के किनारों तक कंक्रीट पहुंचता जा रहा है।
पुनीत टंडन ने कहा है कि यदि इन निर्माणों में पर्यावरणीय मानकों और न्यायालयीय निर्देशों की अनदेखी हुई है तो पूरे मामले की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर इसे न्यायिक मंच तक भी ले जाया जाएगा।
आखिर नैनीताल की नियति क्या होगी? क्या यह शहर आने वाली पीढ़ियों के लिए झीलों, पहाड़ों और हरियाली की धरोहर बनकर बचेगा, या फिर विकास के नाम पर कंक्रीट के बोझ तले अपनी मूल पहचान खो देगा? आज यह सवाल छह हट्स का नहीं, बल्कि पूरे नैनीताल के भविष्य का है।क्योंकि चिंता सिर्फ निर्माण की नहीं है, चिंता उस सोच की है जिसमें प्रकृति को संपदा नहीं, खाली पड़ी जमीन समझ लिया गया है।