पटना का नाम 'पाटलिपुत्र' करने की तैयारी: मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के संकेत के बाद गरमाई सियासत,मगध के गौरवशाली इतिहास को लौटाने की मांग

Move to rename Patna to 'Pataliputra': Politics heats up following indications from Deputy Chief Minister Samrat Chaudhary; demands raised to restore the glorious history of Magadh.

पटना। बिहार की राजनीति में राजधानी पटना का नाम बदलकर एक बार फिर उसका पौराणिक और ऐतिहासिक नाम ‘पाटलिपुत्र’ करने की मांग ने तेजी पकड़ ली है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा इस दिशा में सकारात्मक पहल करने के संकेत के बाद इस मुद्दे पर विमर्श तेज हो गया है। इसे बिहार के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक गौरव की वापसी के रूप में देखा जा रहा है। मौर्य साम्राज्य के स्वर्णकाल में पाटलिपुत्र सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर राजनीतिक, प्रशासनिक और बौद्धिक केंद्र के रूप में विख्यात था। 

किसी भी ऐतिहासिक या बड़े शहर का नाम बदलना महज एक घोषणा से संभव नहीं होता, बल्कि यह एक लंबी और जटिल प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत होता है। पटना का नाम बदलने के लिए मुख्य रूप से इन चरणों से गुजरना होगा। सबसे पहले राज्य सरकार की कैबिनेट में नाम बदलने का प्रस्ताव पारित किया जाएगा, जिसके बाद इसे राज्य विधानसभा से मंजूरी दिलानी होगी।विधानसभा से पारित होने के बाद इस प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजा जाता है। केंद्रीय गृह मंत्रालय इसके बाद रेलवे, डाक विभाग, भारतीय सर्वेक्षण और सड़क परिवहन मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभागों से अनापत्ति प्रमाण पत्र मांगता है। सभी विभागों से हरी झंडी मिलने के बाद ही केंद्र सरकार द्वारा नाम बदलने की आधिकारिक अधिसूचना जारी की जाती है। शहर का नाम बदलने की प्रक्रिया जितनी जटिल है, यह उतनी ही खर्चीली भी होती है।  यदि इलाहाबाद का नाम बदलकर 'प्रयागराज' करने के उदाहरण को देखें, तो उस पूरी प्रक्रिया में लगभग ₹300 करोड़ का बड़ा खर्च आया था। अनुमान है कि पटना का नाम बदलने पर भी सरकारी खजाने पर भारी-भरकम वित्तीय बोझ पड़ेगा। इस मांग के पीछे का मुख्य उद्देश्य मगध साम्राज्य की समृद्ध विरासत को सम्मान देना है, जिसकी पहचान अशोक स्तंभ से जुड़ी है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा सहित कई जानकारों का तर्क है कि जब कोलकाता, ओडिशा और मुंबई जैसे शहरों की मूल पहचान वापस लाई जा सकती है, तो पटना की क्यों नहीं? वर्ष 2002 से सक्रिय ‘पाटलिपुत्र जागरण अभियान समिति’ के अनुसार, यह बदलाव आने वाली पीढ़ियों को उनके गौरवशाली अतीत से जोड़ेगा। यद्यपि सरकार ने पहले ही एक लोकसभा सीट और रेलवे स्टेशन का नाम पाटलिपुत्र रखा है,लेकिन अब पूरे शहर का नाम बदलने की यह मांग एक जन आंदोलन का रूप ले रही है।