देश की अदालतों पर बढ़ता बोझः लगभग 5 करोड़ मामले लंबित! 70 हजार से अधिक मुकदमे 30 साल से न्याय के इंतजार में! हर दिन लाखों मामलों की सुनवाई, फिर भी नहीं घट रही पेंडेंसी

Mounting burden on the country's courts: nearly 50 million cases pending! Over 70,000 lawsuits have been awaiting justice for 30 years! Lakhs of cases are heard daily, yet the backlog shows no signs

भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने लंबित मामलों का बढ़ता बोझ एक बार फिर गंभीर चिंता का विषय बन गया है। सुप्रीम कोर्ट से लेकर जिला अदालतों तक करोड़ों मुकदमे वर्षों से फैसले का इंतजार कर रहे हैं। ई-कोर्ट्स के वर्चुअल जस्टिस क्लॉक और सुप्रीम कोर्ट के उपलब्ध आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि न्याय तक समय पर पहुंच आज भी देश के सामने एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। देश की जिला एवं अधीनस्थ अदालतों में इस समय 4 करोड़ 97 लाख 20 हजार 786 मामले लंबित हैं। इनमें 70,950 मामले ऐसे हैं जो 30 वर्ष से अधिक पुराने हैं। यानी हजारों परिवार ऐसे हैं, जिनकी एक पूरी पीढ़ी अदालतों के चक्कर काटते हुए गुजर गई, लेकिन अंतिम फैसला आज भी नहीं आ सका।

आंकड़ों के अनुसार 1 वर्ष तक के 1,74,23,068, 2 से 3 वर्ष पुराने 1,19,65,369, 4 से 5 वर्ष पुराने 69,72,795, 6 से 10 वर्ष पुराने 85,26,846, 11 से 20 वर्ष पुराने 41,94,058 तथा 21 से 30 वर्ष पुराने 5,67,700 मामले अभी भी लंबित हैं। यह तस्वीर बताती है कि नए मामलों के साथ-साथ पुराने मुकदमों का बोझ भी लगातार बढ़ता जा रहा है। वहीं सर्वोच्च न्यायालय की स्थिति भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट में 62,791 मामले लंबित थे, जबकि 2025 तक यह संख्या बढ़कर 92,101 हो गई। यानी एक दशक में सर्वोच्च अदालत में लंबित मामलों में लगभग 47 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

हालांकि न्यायपालिका लगातार मामलों के निस्तारण का प्रयास कर रही है। जिला अदालतों में पिछले वर्ष 2,67,18,598 नए मामले दर्ज हुए, जबकि 2,53,59,892 मामलों का निस्तारण किया गया। केस क्लियरेंस रेट (CCR) 95 प्रतिशत रहा। इसका अर्थ है कि अदालतें लगभग उतने ही मामलों का निपटारा कर रही हैं जितने नए मामले दर्ज हो रहे हैं। इसके बावजूद लंबित मामलों का पहाड़ कम नहीं हो पा रहा। ऐसे में सवाल एक नहीं कई खड़े होते हैं कि जब देश डिजिटल इंडिया की ओर तेजी से बढ़ रहा है, तो न्याय मिलने में दशकों की देरी क्यों? अगर हर वर्ष करोड़ों मामलों का निस्तारण हो रहा है, तो लंबित मामलों की संख्या लगातार क्यों बढ़ रही है? क्या अदालतों में न्यायाधीशों के रिक्त पद, आधारभूत ढांचे की कमी और बार-बार स्थगन (Adjournment) इस संकट की बड़ी वजह हैं? क्या 30 वर्ष से अधिक पुराने मामलों के लिए विशेष अभियान चलाने की जरूरत नहीं है? आखिर एक नागरिक को न्याय पाने के लिए अपनी पूरी जिंदगी अदालतों में क्यों बितानी पड़े?

भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को न्याय का अधिकार देता है, लेकिन "विलंबित न्याय, न्याय से वंचित करना है" (Justice delayed is justice denied) केवल एक कानूनी सिद्धांत नहीं, बल्कि आज करोड़ों लोगों की वास्तविकता बन चुका है। न्यायपालिका के प्रयास सराहनीय हैं, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि मौजूदा व्यवस्था पर बोझ उसकी क्षमता से कहीं अधिक है। अगर न्यायाधीशों के रिक्त पद शीघ्र नहीं भरे गए, अदालतों का बुनियादी ढांचा मजबूत नहीं किया गया, तकनीक का व्यापक उपयोग नहीं बढ़ाया गया और पुराने मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए विशेष अभियान नहीं चलाए गए, तो आने वाले वर्षों में लंबित मामलों का आंकड़ा और भी भयावह हो सकता है। न्याय केवल मिलना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समय पर मिलना भी उतना ही आवश्यक है। यही किसी भी लोकतांत्रिक न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी कसौटी है।