सुप्रीम कोर्ट में वकील का हंगामाः जजों को देने लगा आदेश! फाइल फेंककर कहे अपशब्द, बोला- ये दे देना सीजेआई को, जानें क्या है पूरा मामला?

Lawyer creates a ruckus in the Supreme Court: Starts issuing orders to the judges! Hurls a file while using abusive language and says, "Give this to the CJI"—find out the full story.

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को उस समय हड़कंप मच गया, जब सुनवाई के दौरान एक वकील द्वारा हंगामा किया गया। वकील ने सीजेआई सूर्यकांत को अपशब्द कहे और फाइल भी फेंकी। इस दौरान सीजेआई कोर्ट रूम में मौजूद नहीं थे। इस घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो में वकील देश के चीफ जस्टिस के खिलाफ अपशब्द बोलते हुए, कागज उछालता हुआ दिखा। साथ ही कहा कि लखनऊ के एक पुलिस अधिकारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का हुक्म दे रहा हूं। इस पूरे नाटकीय घटनाक्रम ने सभी को हैरत में डाल दिया है। यह पूरा मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश से जुड़ा था। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। याचिकाकर्ता का नाम प्रबल प्रताप है। वह इस मामले में खुद पैरवी करने कोर्ट पहुंचा था। सुनवाई शुरू होते ही वह जजों पर चिल्लाने लगा। उसने जजों को 'जुडिशियल सर्वेंट' कहना शुरू कर दिया। उसने दावा किया कि वह खुद 'संप्रभु' यानी सबसे ऊपर है। प्रबल प्रताप ने जजों को रौब दिखाते हुए कहा, 'मिस्टर जुडिशियल सर्वेंट, मैं आपको आदेश देता हूं। आप लखनऊ के एसीपी विकास नगर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश जारी करें।' इस बात पर जस्टिस विश्वनाथन चौंक गए। उन्होंने पूछा, 'क्या आप हमें आदेश दे रहे हैं?' इसके बाद माहौल और खराब हो गया। याचिकाकर्ता ने गुस्से में केस के सारे कागज हवा में फेंक दिए। जब सुरक्षाकर्मी उसे बाहर ले जाने लगे, तो उसने सीजेआई के लिए बेहद अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। इस घटनाक्रम के बाद भी सुप्रीम कोर्ट ने कोई कड़ा कदम नहीं उठाया। पीठ ने याचिकाकर्ता के खिलाफ अवमानना का केस दर्ज नहीं किया। कोर्ट ने अपने लिखित आदेश में इसकी वजह भी साफ बताई है। जजों ने जानबूझकर कोई कानूनी एक्शन नहीं लेने का फैसला किया। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता की स्थिति और हालत को देखते हुए हम उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करना चाहते हैं। अदालत ने उस व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक स्थिति पर सहानुभूति दिखाई। जजों ने इस हंगामे से अपना ध्यान नहीं भटकाया। उन्होंने ठंडे दिमाग से केस की कानूनी मेरिट को देखा। कोर्ट को इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में कोई खामी नहीं मिली। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उसकी विशेष अनुमति याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।