झारखंड का 'ओलंपिक' दम: जयपाल सिंह मुंडा के पहले गोल्ड से लेकर दीपिका-सलीमा तक, विश्व मंच पर चमकी जंगलों की धरती

Jharkhand's 'Olympic' Might: From Jaipal Singh Munda's First Gold to Deepika and Salima—The Land of Forests Shines on the Global Stage

रांची। जब भी देश-दुनिया में 'झारखंड' का नाम लिया जाता है, तो अमूमन लोगों के जेहन में प्रचुर खनिज संपदा, घने जंगल, समृद्ध आदिवासी संस्कृति और मनोरम प्राकृतिक सौंदर्य की तस्वीरें उभरती हैं। लेकिन पिछले कुछ दशकों में इस वीर भूमि ने अपनी एक और नायाब पहचान दुनिया के नक्शे पर दर्ज कराई है-देश के सबसे उत्कृष्ट खेल दिग्गजों की जननी" के रूप में। आर्थिक तंगहाली, संसाधनों की घोर कमी और सीमित खेल सुविधाओं की पथरीली राहों को पार कर झारखंड के जांबाजों ने दुनिया के सबसे बड़े खेल महाकुंभ यानी 'ओलंपिक' तक का सफर तय किया है। 23 जून को पूरा विश्व 'ओलंपिक दिवस' मना रहा है। यह खास दिन केवल खेलों के उत्सव का नहीं, बल्कि झारखंड के उन 12 महान ओलंपियनों के अविश्वसनीय संघर्ष, अटूट समर्पण और उस माटी की गौरवगाथा को सलाम करने का अवसर है, जिसने अभावों के बीच से वैश्विक विजेता तैयार किए। झारखंड की इस सुनहरी ओलंपिक यात्रा की शुरुआत उस अमर नाम से होती है, जिसे खेल और भारतीय राजनीति, दोनों ही क्षेत्रों में अत्यंत आदर और श्रद्धा के साथ याद किया जाता है मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा। साल 1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक में जयपाल सिंह मुंडा ने भारतीय राष्ट्रीय हॉकी टीम की कप्तानी की थी। उनके जांबाज नेतृत्व में ही भारत ने इतिहास का अपना पहला ओलंपिक स्वर्ण पदक जीता था। यह वह स्वर्णिम दौर था जब दुनिया भारतीय हॉकी के जादू से खौफ खाती थी और उस ऐतिहासिक क्रांति के सूत्रधार झारखंड के एक सुदूर गांव के बेटे थे। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से शिक्षित विद्वान और भारतीय संविधान सभा के सम्मानित सदस्य रहे जयपाल सिंह ने खेल के मैदान पर जो गौरवशाली लकीर खींची, वह आज भी करोड़ों युवाओं के लिए मशाल का काम कर रही है।

झारखंड के छोटानागपुर पठार और आदिवासी बहुल इलाकों ने भारतीय हॉकी को ऐसे अभेद्य योद्धा दिए हैं, जिन्होंने मैदान पर 'हॉकी की दीवार' खड़ी कर दी। देश के सर्वश्रेष्ठ फुल-बैक खिलाड़ियों में शुमार किंडो ने भारत को कांस्य पदक दिलाने में मुख्य भूमिका निभाई थी। वह 1975 की विश्व कप विजेता टीम के भी स्तंभ थे। गरीबी के दिनों में जंगलों से बांस काटकर खुद अपनी हॉकी स्टिक बनाने वाले डुंगडुंग ने मॉस्को में देश को गोल्ड मेडल जिताने के लिए जी-जान लगा दी थी। इन दोनों ही महारथियों ने अपने कड़े डिफेंस और अनुशासित खेल की बदौलत यह साबित किया कि भारतीय हॉकी टीम झारखंड के शेरों के बिना अधूरी है। वक्त बदला, रूढ़ियां टूटीं और अब झारखंड की बेटियों ने दुनिया के मैदानों पर तहलका मचाना शुरू किया। खूंटी जिले के एक बेहद छोटे से गांव से निकलकर निक्की प्रधान ने इतिहास रचा, जब वह झारखंड की पहली महिला हॉकी खिलाड़ी बनीं जिन्होंने 2016 (रियो) और 2020 (टोक्यो) ओलंपिक में लगातार भारत का प्रतिनिधित्व किया। उन्हीं के पदचिन्हों पर चलते हुए सिमडेगा की गति और ऊर्जा की मिसाल सलीमा टेटे आज भारतीय महिला हॉकी टीम की सबसे भरोसेमंद स्तंभ और रीढ़ बन चुकी हैं। गांव के उबड़-खाबड़ मैदानों से ओलंपिक के चमचमाते एस्ट्रोटर्फ तक का इनका सफर हर उस बेटी की कहानी है जो अपनी किस्मत खुद लिखना जानती है।

झारखंड के आदिवासी समाज में तीर-कमान केवल एक हथियार नहीं, बल्कि उनकी रगों में दौड़ती संस्कृति का हिस्सा है। यही कारण है कि इस माटी ने देश को बेमिसाल निशानेबाज दिए हैं। रांची के रातू की रहने वाली दीपिका कुमारी की कहानी किसी चमत्कार से कम नहीं है। एक साधारण ऑटो चालक के परिवार में जन्मी दीपिका ने शुरुआती दिनों में बांस के बने देसी धनुष से निशाना साधना सीखा। अपनी अटूट एकाग्रता के दम पर वह दुनिया की 'नंबर-1' तीरंदाज बनीं। 2012 (लंदन), 2016 (रियो), 2020 (टोक्यो) और 2024 (पेरिस) समेत लगातार चार ओलंपिक खेलने का अद्भुत रिकॉर्ड दीपिका के नाम दर्ज है। उनके साथ 2016 में लक्ष्मी रानी माझी और 2004 (एथेंस) में पहली महिला तीरंदाज ओलंपियन बनकर रीना कुमारी ने राज्य का मान बढ़ाया था। अब झारखंड की प्रतिभा सिर्फ हॉकी और तीरंदाजी तक सीमित नहीं है। साल 2024 के पेरिस ओलंपिक में चतरा जिले के विकास सिंह ने 20 किलोमीटर रेस वॉक (पैदल चाल) स्पर्धा में भारत का प्रतिनिधित्व कर एथलेटिक्स की दुनिया में नया इतिहास रच दिया है। इसके अलावा 1980 के मॉस्को ओलंपिक में भारतीय बास्केटबॉल टीम का हिस्सा रहे हरभजन सिंह और बॉक्सिंग रिंग में अंतरराष्ट्रीय पदक जीतने वाली अरुणा मिश्रा ने यह दिखा दिया है कि इस राज्य के पास हर खेल के लिए जरूरी 'नेचुरल फिटनेस' और 'जीन' मौजूद हैं। हाल के वर्षों में सिमडेगा, खूंटी और रांची में बनी खेल अकादमियों और एस्ट्रोटर्फ मैदानों ने ग्रामीण टैलेंट को सही मंच और तराशने का काम किया है। आज झारखंड के सुदूर जंगलों और गांवों में कोई बच्चा हाथ में बांस की कमानी लेकर निशाना साध रहा है, तो कोई नंगे पैर मिट्टी के मैदानों में दौड़ लगा रहा है। जयपाल सिंह मुंडा से शुरू हुआ यह कारवां आज विकास और सलीमा तक पहुंच चुका है, और खेल प्रेमियों को पूरा भरोसा है कि आने वाले समय में पदक तालिका में झारखंड के वीरों का नाम सबसे ऊपर चमकेगा।