Oct 26, 2026 Login
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इनसाइड स्टोरी: रुद्रपुर मोक्ष धाम में फर्जीवाड़े का खेल,मीडिया की खबर के बाद बैकफुट पर आए 'स्वयंभू सेवादार,लिंक में जानें फर्जीवाड़े का नापाक खेल

Inside Story: The game of fraud at Rudrapur Moksha Dham; 'self-proclaimed caretakers' on the back foot following media reports—find out the details of this nefarious scheme via the link.

रुद्रपुर। सत्ता का नशा और राजनीतिक शह जब इंसानी संवेदनाओं पर हावी हो जाए, तो मोक्ष धाम जैसी पवित्र जगह भी भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े का अड्डा बन जाती है। ऊधम सिंह नगर जिला मुख्यालय रुद्रपुर स्थित ट्रांजिट कैंप-शिवनगर के मोक्ष धाम (शमशान घाट) में ऐसा ही एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। यहां एक ही मृतक के दो-दो 'मूल' दाह संस्कार प्रमाण पत्र जारी कर बड़ा खेल रचने की साजिश रची गई। हांलाकि, 'आवाज इंडिया वेब पोर्टल' और 'आवाज इंडिया डिजिटल' के फेसबुक पेज पर इस धांधली की खबर प्रमुखता से प्रकाशित होने के बाद तंत्र में हड़कंप मच गया और फर्जीवाड़े का यह नापाक खेल आखिरकार रुक गया।

पूरे विवाद की जड़ ट्रांजिट कैंप निवासी संजय कीर्तनीय के पिता के देहांत से जुड़ी है। पिता के स्वर्गवास के बाद परिजनों ने मोक्ष धाम में उनका दाह संस्कार किया। नियमतः दाह संस्कार के बाद मोक्ष धाम की ओर से परिवार को एक अधिकृत संस्कार प्रमाण पत्र जारी किया जाता है, जो आगे चलकर नगर निगम से मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने के लिए अनिवार्य दस्तावेज होता है। संजय कीर्तनीय का अपने पिता के साथ संपत्ति को लेकर एक परिजन से पुराना विवाद चल रहा था। पिता के निधन के बाद जब संजय को इस प्रमाण पत्र की आवश्यकता पड़ी, तो उन्हें दर-दर भटकने पर मजबूर कर दिया गया। आरोप है कि स्थानीय भाजपा और कांग्रेस के कुछ प्रभावशाली नेताओं के दबाव में मोक्ष धाम के स्वयंभू मुख्य सेवादार ने संजय कीर्तनीय को प्रमाण पत्र जारी तो किया, लेकिन सत्ता और राजनीतिक रसूख के आगे घुटने टेकते हुए उसी मृतक के नाम पर दूसरा मूल संस्कार प्रमाण पत्र परिजन को भी जारी कर दिया। जब संजय कीर्तनीय अपने पिता का मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने नगर निगम रुद्रपुर पहुंचे, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। अधिकारियों के दरबार में उन्हें पता चला कि उनके रिश्तेदार ने भी उसी दाह संस्कार प्रमाण पत्र के आधार पर आवेदन किया हुआ है। संजय ने निगम अधिकारियों के सामने कड़ा ऐतराज जताते हुए सवाल उठाया कि-एक ही व्यक्ति के दाह संस्कार के दो-दो मूल प्रमाण पत्र कैसे काटे जा सकते हैं? जब मुख्य वारिस और पुत्र के नाते मैंने संस्कार किया, तो दूसरा प्रमाण पत्र किसके इशारे पर जारी हुआ?" मामले की गंभीरता को देखते हुए नगर निगम के अधिकारियों ने मोक्ष धाम के स्वयंभू सेवादार को जमकर फटकार लगाई। 

सूत्रों और क्षेत्रीय चर्चाओं के अनुसार, स्वयंभू मुख्य सेवादार को पहले अपनी इस करतूत का कोई पछतावा नहीं था। वह अपने पैसे और राजनीतिक पहुँच की दुहाई देकर बेखौफ घूम रहा था। लेकिन जैसे ही 'आवाज इंडिया' ने इस पूरे फर्जीवाड़े की परतें उघेड़ीं, सेवादार और उसके आकाओं में खलबली मच गई। मामले को बिगड़ता देख भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों के कुछ नेताओं ने नैतिक मूल्यों को ताक पर रखकर इस स्वयंभू सेवादार का बचाव करना शुरू कर दिया। आनन-फानन में मामले को दबाने के लिए नगर निगम में सेवादार से एक सफाई लिखवाकर दी गई कि 'संजय के परिवार वालों ने गुमराह करके दूसरी पर्ची कटवाई थी।' बाद में मीडिया के सामने आकर सेवादार ने इसे महज एक "पारिवारिक कलह" बताकर खुद को पूरी तरह पाक-साफ साबित करने की कोशिश भी की। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या राजनीति इतनी गिर चुकी है कि जिस व्यक्ति का समाज और उसके पद से सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए था, उसे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर नेता संरक्षण दे रहे हैं? यह पूरा प्रकरण इस बात का जीवंत प्रमाण है कि किस तरह दबी जुबान में पहले खुद को सेवादार घोषित करने वाले लोग बाद में राजनीतिक शह पाकर अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देते हैं। 'आवाज इंडिया' पूरी ताकत और निष्पक्षता के साथ इस तरह के फर्जीवाड़े, अनैतिक कार्यों और ऐसे सफेदपोशों और स्वयंभू आकाओं का पर्दाफाश करता रहेगा।