Sep 11, 2026 Login

हरिद्वार के 230 कोल्हुओं पर हाईकोर्ट की नजर! प्लास्टिक-रबर जलाने के आरोप पर 116 की जांच, 3.25 लाख जुर्माना

High Court scrutinizes 230 crushers in Haridwar; 116 under investigation for burning plastic and rubber, fines totaling ₹3.25 lakh imposed.

नैनीताल। हरिद्वार के झबरेड़ा क्षेत्र में गुड़ बनाने वाले कोल्हुओं में प्लास्टिक, रबर और अन्य कचरा जलाए जाने से होने वाले प्रदूषण का मामला उत्तराखंड हाइकोर्ट पहुंचा। विकास सैनी  अर्जुन बनाम उत्तराखंड राज्य व अन्य जनहित याचिका में सुनवाई के दौरान उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जिले में संचालित कोल्हुओं और उनके खिलाफ की गई कार्रवाई का ब्यौरा कोर्ट के समक्ष रखा। बोर्ड के अनुसार हरिद्वार जिले में कुल 230 कोल्हू संचालित हैं, जिनमें से 116 का निरीक्षण किया जा चुका है। निरीक्षण के दौरान कुछ इकाइयों में भट्ठियों के लिए प्लास्टिक और रबर कचरे के इस्तेमाल की बात सामने आई, जिसके बाद अब तक कुल 3.25 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है। हाईकोर्ट ने मामले में आगे की कार्रवाई का विवरण रिकॉर्ड पर रखने के निर्देश दिए हैं और सुनवाई चार सप्ताह बाद करने को कहा है।

अधिवक्ता प्रभा नैथानी ने बताया कि ये जनहित याचिका झबरेड़ा निवासी विकास सैनी अर्जुन की ओर से दाखिल की गई है। याचिका में कहा गया है कि झबरेड़ा नगर पंचायत और उसके आसपास 200 से अधिक गुड़ बनाने वाले कोल्हू संचालित हैं, जिनमें कई आबादी, सड़कों और अन्य संवेदनशील स्थानों के नजदीक स्थित हैं। याचिकाकर्ता का आरोप है कि कुछ इकाइयों में कृषि अवशेषों के अलावा प्लास्टिक, रबर और इस्तेमाल किए गए टायर तक ईंधन के तौर पर जलाए जा रहे हैं, जिससे काला और जहरीला धुआं निकलता है तथा वायु प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी खतरा पैदा हो रहा है। याचिका में यह भी दावा किया गया है कि कुछ कोल्हू पेट्रोल पंपों के आसपास स्थित हैं, जहां बड़ी मात्रा में ज्वलनशील सामग्री रखे जाने से आग और सार्वजनिक सुरक्षा का खतरा भी बना हुआ है।

याचिका में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कोल्हुओं के लिए जारी गाइडलाइन का हवाला देते हुए प्लास्टिक, रबर और इस्तेमाल किए गए टायर को ईंधन के रूप में जलाने पर रोक तथा आबादी, स्कूल, अस्पताल और संवेदनशील क्षेत्रों से निर्धारित दूरी बनाए रखने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने सभी कोल्हुओं का व्यापक सर्वे और निरीक्षण कराने, पर्यावरणीय मानकों का उल्लंघन करने वाली इकाइयों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई करने और गुड़ उत्पादन के मौसम में नियमित निगरानी की व्यवस्था करने की मांग की है।

सुनवाई के दौरान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से कोर्ट को बताया गया कि अधिकांश कोल्हू सीमांत किसानों से जुड़े हैं और उनका संचालन मौसमी प्रकृति का है। बोर्ड के अनुसार कई संचालक पर्यावरणीय नियमों और आवश्यक सहमति की प्रक्रिया से पूरी तरह परिचित नहीं हैं। इसी वजह से केवल इकाइयों को सील करना समस्या का स्थायी समाधान नहीं माना जा रहा है। बोर्ड ने बताया कि इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम, देहरादून के सहयोग से ऊर्जा दक्ष भट्ठियों और चिमनियों की तकनीक पर काम किया जा रहा है। पहले चरण में पांच कोल्हुओं को रेट्रोफिट किया जाएगा। इसके परिणामों के आधार पर आगे बेहतर तकनीक अपनाने की योजना है।

बोर्ड ने यह भी बताया कि जिन कुछ इकाइयों को सील किया गया, वहां रखा कच्चा माल जल्दी खराब होने वाला था और सीलिंग के बाद वह खराब हो गया। ऐसे में पर्यावरणीय मानकों का पालन कराने के साथ सीमांत किसानों की आजीविका का पहलू भी ध्यान में रखना होगा। वहीं, याचिका में आरोप लगाया गया है कि इस मामले को केवल पारंपरिक कृषि गतिविधि मानकर नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि बड़ी संख्या में भट्टियां एक ही क्षेत्र में संचालित होने से प्रदूषण और आग का सामूहिक खतरा पैदा हो सकता है।

मामले में याचिकाकर्ता की ओर से वर्ष 2024 से ही प्रशासन को शिकायतें दिए जाने का उल्लेख किया गया है। याचिका के अनुसार 10 अक्टूबर 2024 को जिलाधिकारी हरिद्वार को शिकायत दी गई थी, जबकि 24 अगस्त 2026 और 5 सितंबर 2026 को भी कोल्हुओं से होने वाले प्रदूषण, आबादी से दूरी और प्लास्टिक-रबर जलाने पर रोक लगाने को लेकर अभ्यावेदन दिए गए। याचिका में इन शिकायतों के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाया गया है।

जनहित याचिका में हाईकोर्ट से मांग की गई है कि हरिद्वार जिले में कोल्हुओं पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की गाइडलाइन सख्ती से लागू कराई जाए। इसके साथ ही झबरेड़ा और आसपास संचालित सभी इकाइयों का व्यापक निरीक्षण कर बिना जरूरी अनुमति या पर्यावरणीय मानकों का उल्लंघन करने वाली इकाइयों पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। याचिका में प्लास्टिक, रबर और इस्तेमाल किए गए टायर जलाने पर रोक, निर्धारित दूरी के मानकों का पालन और गुड़ उत्पादन सीजन में औचक निरीक्षण व निगरानी तंत्र विकसित करने की मांग भी की गई है। सुनवाई के बाद मामले को चार सप्ताह बाद फिर सूचीबद्ध किया गया है।