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हल्द्वानी: एसटीएच में पीजी डॉक्टरों की हड़ताल से चरमराई ओपीडी, स्टाइपेंड ₹1 लाख करने की मांग पर अड़े रेजिडेंट्स

🕒 Last Updated:2026-09-12 20:28:03
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कुमाऊं के सबसे बड़े राजकीय सुशीला तिवारी अस्पताल में स्वास्थ्य व्यवस्थाएं शनिवार को उस समय पटरी से उतर गईं, जब स्टाइपेंड वृद्धि की मांग को लेकर आंदोलनरत पीजी रेजिडेंट डॉक्टरों ने अपनी हड़ताल जारी रखी।
हल्द्वानी: एसटीएच में पीजी डॉक्टरों की हड़ताल से चरमराई ओपीडी, स्टाइपेंड ₹1 लाख करने की मांग पर अड़े रेजिडेंट्स

हल्द्वानी: एसटीएच में पीजी डॉक्टरों की हड़ताल से चरमराई ओपीडी, स्टाइपेंड ₹1 लाख करने की मांग पर अड़े रेजिडेंट्स (सांकेतिक तस्वीर)

⚡ख़बरें फटाफट (संक्षेप में)

⏱️ 30-Sec Glance
  • कुमाऊं के सबसे बड़े राजकीय सुशीला तिवारी अस्पताल में स्वास्थ्य व्यवस्थाएं शनिवार को उस समय पटरी से उतर गईं, जब स्टाइपेंड वृद्धि की मांग को लेकर आंदोलनरत पीजी रेजिडेंट डॉक्टरों ने अपनी हड़ताल जारी रखी।
  • डॉक्टरों के कड़े रुख के कारण अस्पताल की ओपीडी  सेवाएं और पर्चा काउंटर पूरी तरह ठप हो गए।
  • सुदूर पहाड़ी और ग्रामीण इलाकों से इलाज की आस लेकर पहुंचे सैकड़ों मरीजों और उनके तीमारदारों को भीषण गर्मी व अनिश्चितता के बीच भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा।
  • यद्यपि अस्पताल प्रशासन की तत्परता और वार्ता के बाद पर्चा सेवा पुनः बहाल करा दी गई, लेकिन पीजी डॉक्टरों के हड़ताल पर डटे रहने से अस्पताल की नियमित चिकित्सा सेवाओं पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।

हल्द्वानी। कुमाऊं के सबसे बड़े राजकीय सुशीला तिवारी अस्पताल में स्वास्थ्य व्यवस्थाएं शनिवार को उस समय पटरी से उतर गईं, जब स्टाइपेंड वृद्धि की मांग को लेकर आंदोलनरत पीजी रेजिडेंट डॉक्टरों ने अपनी हड़ताल जारी रखी। डॉक्टरों के कड़े रुख के कारण अस्पताल की ओपीडी  सेवाएं और पर्चा काउंटर पूरी तरह ठप हो गए। सुदूर पहाड़ी और ग्रामीण इलाकों से इलाज की आस लेकर पहुंचे सैकड़ों मरीजों और उनके तीमारदारों को भीषण गर्मी व अनिश्चितता के बीच भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा। यद्यपि अस्पताल प्रशासन की तत्परता और वार्ता के बाद पर्चा सेवा पुनः बहाल करा दी गई, लेकिन पीजी डॉक्टरों के हड़ताल पर डटे रहने से अस्पताल की नियमित चिकित्सा सेवाओं पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।

हल्द्वानी के सुशीला तिवारी अस्पताल (एसटीएच) में शनिवार को स्वास्थ्य सेवाएं एक बार फिर दबाव में नजर आईं। न्यूनतम एक लाख रुपये मासिक स्टाइपेंड की मांग को लेकर आंदोलनरत पीजी रेजिडेंट डॉक्टरों ने हड़ताल जारी रखी, जिसका सीधा असर अस्पताल की ओपीडी सेवाओं पर पड़ा। डॉक्टरों के काम से दूर रहने के कारण बड़ी संख्या में मरीजों को इलाज के लिए भटकना पड़ा। अस्पताल परिसर में पर्चा बनवाने से लेकर चिकित्सकीय परामर्श तक के लिए मरीजों और तीमारदारों को परेशानी का सामना करना पड़ा। एसटीएच में उपचार के लिए हल्द्वानी के अलावा कुमाऊं के दूरदराज पहाड़ी जिलों और ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में मरीज पहुंचते हैं। शनिवार को भी सुबह से ही अस्पताल में मरीजों की आवाजाही बनी रही। लेकिन पीजी रेजिडेंट डॉक्टरों की हड़ताल के कारण नियमित चिकित्सा व्यवस्था प्रभावित होने लगी। ओपीडी सेवा बाधित होने से मरीजों को यह समझ नहीं आ रहा था कि उनका उपचार कब शुरू होगा। कई मरीज और उनके तीमारदार अस्पताल परिसर में इंतजार करते दिखाई दिए। हड़ताल के दौरान पर्चा काउंटर भी प्रभावित हुआ, जिससे स्थिति और गंभीर हो गई। इलाज की उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंचे मरीजों को पहले पर्चा बनवाने के लिए परेशानी उठानी पड़ी। गर्मी और भीड़ के बीच लंबे समय तक इंतजार ने मरीजों की मुश्किलें और बढ़ा दीं। खासकर दूरदराज क्षेत्रों से आए मरीजों के सामने सबसे बड़ी चिंता यह रही कि यदि अस्पताल में उपचार नहीं मिला तो उन्हें वापस लौटना पड़ेगा या निजी अस्पताल का रुख करना होगा। हालात बिगड़ते देख अस्पताल प्रशासन ने आंदोलनरत डॉक्टरों से बातचीत की। प्रशासन की पहल के बाद पर्चा सेवा को दोबारा बहाल कराया गया, जिससे मरीजों को कुछ राहत मिली। हालांकि पीजी रेजिडेंट डॉक्टरों ने अपनी मुख्य मांग को लेकर हड़ताल समाप्त नहीं की। ऐसे में अस्पताल की नियमित चिकित्सा सेवाओं पर दबाव बना हुआ है। रेजिडेंट डॉक्टरों का कहना है कि स्टाइपेंड में बढ़ोतरी उनकी लंबे समय से चली आ रही मांग है। उनका तर्क है कि पीजी डॉक्टर अस्पताल में मरीजों के उपचार और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसके बावजूद उन्हें अपेक्षित स्तर का स्टाइपेंड नहीं मिल रहा है। इसी मांग को लेकर डॉक्टर आंदोलन कर रहे हैं। एसटीएच जैसे बड़े सरकारी अस्पताल में पीजी रेजिडेंट डॉक्टरों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। ओपीडी से लेकर वार्ड और विभिन्न चिकित्सा सेवाओं में इन डॉक्टरों की जिम्मेदारी रहती है। ऐसे में हड़ताल लंबी खिंचने पर मरीजों को परेशानी होने के साथ अस्पताल के अन्य चिकित्सकों और स्टाफ पर भी अतिरिक्त कार्यभार बढ़ने की आशंका है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि मरीजों को राहत कब तक मिलेगी। एक तरफ डॉक्टर अपनी मांगों पर अड़े हैं, वहीं दूसरी ओर अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को तत्काल उपचार की जरूरत है। ऐसे में प्रशासन के सामने डॉक्टरों की मांगों पर समाधान निकालने के साथ अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था को सामान्य बनाए रखने की दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है। शनिवार की घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की मांगों और मरीजों के हितों के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए। फिलहाल पर्चा सेवा बहाल होने से तत्काल राहत जरूर मिली है, लेकिन पीजी डॉक्टरों की हड़ताल जारी रहने से एसटीएच की स्वास्थ्य सेवाओं पर संकट पूरी तरह टला नहीं है।

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