Dowry Death Case: हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी:क्रूरता साबित हुए बिना नहीं बनता दहेज हत्या का मामला,खारिज किया दहेज हत्या का मामला
लखनऊ: दहेज हत्या के मामलों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल दहेज की मांग के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि दहेज हत्या साबित करने के लिए मृतका के साथ क्रूरता या उत्पीड़न के ठोस और स्पष्ट प्रमाण होना अनिवार्य है।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि दहेज की मांग और महिला की मृत्यु के बीच प्रत्यक्ष और मजबूत संबंध स्थापित होना चाहिए। यदि क्रूरता या हिंसा के पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं, तो मामला दहेज हत्या की श्रेणी में नहीं आएगा।
यह फैसला वर्ष 1999 के एक मामले में सुनाया गया, जिसमें मेवा लाल समेत अन्य आरोपियों ने सत्र अदालत द्वारा सुनाई गई 7 वर्ष की सजा को चुनौती दी थी। मामला लखनऊ के बंथरा थाना क्षेत्र का है, जहां एक महिला की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हुई थी। मृतका के परिजनों ने आरोप लगाया था कि दहेज की मांग पूरी न होने पर उसे जहर देकर मार दिया गया।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि मृतका के शरीर पर किसी प्रकार की चोट के निशान नहीं थे और पोस्टमार्टम की विसरा रिपोर्ट में भी जहर दिए जाने का कोई प्रमाण नहीं मिला। अदालत ने इन तथ्यों को गंभीरता से लेते हुए कहा कि जब तक मृत्यु को अस्वाभाविक या हिंसात्मक रूप से जुड़ा साबित नहीं किया जाता, तब तक इसे दहेज हत्या नहीं माना जा सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 304B के तहत दोषसिद्धि के लिए यह जरूरी है कि दहेज उत्पीड़न और मृत्यु के बीच सीधा संबंध साबित हो। केवल दहेज की मांग या उससे संबंधित बातचीत को आधार बनाकर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता।
सभी साक्ष्यों, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और चिकित्सकीय राय के आधार पर अदालत ने पाया कि इस मामले में मृत्यु को न तो स्पष्ट रूप से अस्वाभाविक सिद्ध किया जा सका और न ही दहेज उत्पीड़न से जोड़ने वाले पर्याप्त प्रमाण मिले। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को खारिज करते हुए आरोपियों को राहत प्रदान की।
यह फैसला दहेज हत्या से जुड़े मामलों में साक्ष्यों की अहमियत को रेखांकित करता है और भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी दृष्टांत के रूप में देखा जा रहा है।