सोशल मीडिया पर 'डिजिटल लक्ष्मण रेखा': 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए बैन की उठी मांग, पीएम मोदी की सराहना से चर्चा तेज
आगरा। स्मार्टफोन की स्क्रीन पर अंगुलियां फिराते और रील्स की दुनिया में खोए रहने वाले मासूमों के बचपन को बचाने के लिए अब देश में एक बड़ी बहस छिड़ गई है। ऑस्ट्रेलिया में 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है। इस कड़े कानून की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से की गई सराहना के बाद अब ताजनगरी आगरा सहित देश के तमाम हिस्सों में हलचल तेज हो गई है। जागरूक अभिभावक और शिक्षाविद अब भारत में भी इसी तरह का सख्त कानून लागू करने की मांग उठाने लगे हैं।
स्थानीय अभिभावकों का मानना है कि सोशल मीडिया की वर्चुअल दुनिया बच्चों के वास्तविक बचपन को निगल रही है। घंटों स्क्रीन के सामने बिताने के कारण बच्चों का पढ़ाई, आउटडोर खेलकूद और परिवार के साथ बातचीत का समय लगभग खत्म हो चुका है, जिससे उनका मानसिक और शारीरिक विकास गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है। अभिभावकों ने सोशल मीडिया के बढ़ते दुष्प्रभावों को लेकर गहरी चिंता जताई है। अग्रसेनपुरम निवासी गृहिणी श्वेता यादव कहती हैं,आज के बच्चे किताबों से ज्यादा मोबाइल से चिपके रहते हैं। सोशल मीडिया पर रोक लगने से वे वापस पढ़ाई, रचनात्मकता और खेलकूद की ओर लौटेंगे। भारत सरकार को इस दिशा में तुरंत कड़ा कदम उठाना चाहिए। जयपुर हाउस निवासी विकास गोयल का मानना है कि सोशल मीडिया पर बच्चों के सामने ऐसी अनुचित सामग्री आ जाती है, जो उनकी उम्र के अनुकूल नहीं होती। कम उम्र में इन चीजों को देखने से उनके व्यवहार और सोच में नकारात्मक बदलाव आ रहे हैं। दयालबाग की रहने वाली विनीता शर्मा का कहना है कि तकनीक से बच्चों को पूरी तरह दूर नहीं किया जा सकता, लेकिन इसकी एक न्यूनतम उम्र तय होना बेहद जरूरी है। 16 साल से पहले सोशल मीडिया की जगह केवल रचनात्मक गतिविधियों को ही प्राथमिकता मिलनी चाहिए। बहस केवल प्रतिबंध तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके क्रियान्वयन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। बल्केश्वर निवासी मनोज शर्मा ने जोर देते हुए कहा कि जब तक सोशल मीडिया कंपनियों पर कड़े जुर्माने और उम्र के सत्यापन को लेकर सख्त नियम नहीं बनेंगे, तब तक बच्चे फर्जी उम्र बताकर अकाउंट बनाते रहेंगे। सरकार की सख्ती से न केवल ऑनलाइन लत छूटेगी, बल्कि बच्चे 'साइबर बुलिंग' और ऑनलाइन फ्रॉड जैसी खतरनाक समस्याओं से भी सुरक्षित रह सकेंगे। अभिभावकों और विशेषज्ञों ने केवल कानून बनाने के साथ-साथ जागरूकता पर भी जोर दिया है। मांग की जा रही है कि सभी सरकारी और निजी स्कूलों में डिजिटल साक्षरता और साइबर सुरक्षा को लेकर नियमित जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए, ताकि बच्चों को इंटरनेट के सुरक्षित उपयोग की समझ दी जा सके। अब देखना यह है कि वैश्विक मंच पर ऑस्ट्रेलिया के इस कदम की सराहना करने के बाद, क्या भारत सरकार भी देश के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए जल्द ही कोई ठोस नीतिगत फैसला लेती है।