नैनीताल:16 साल से संविदा पर कार्यरत असिस्टेंट प्रोफेसर के मामले में हाईकोर्ट सख्त, कुमाऊं विश्वविद्यालय को 4 हफ्ते में फैसला करने का निर्देश

Case of Assistant Professor Working on Contract for 16 Years: High Court Takes Strict Stance, Directs Kumaon University to Take a Decision Within 4 Weeks

नैनीताल में लंबे समय से संविदा पर कार्यरत असिस्टेंट प्रोफेसर के नियमितीकरण के मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कुमाऊं विश्वविद्यालय और राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा है कि याचिकाकर्ता के दावे पर नियमानुसार विचार करते हुए चार सप्ताह के भीतर अंतिम निर्णय लिया जाए। यह मामला करीब 16 वर्षों से संविदा पर सेवाएं दे रही कॉमर्स विषय की असिस्टेंट प्रोफेसर से जुड़ा है, जिसने अपने नियमितीकरण की मांग को लेकर न्यायालय की शरण ली है।
याचिकाकर्ता ममता जोशी लोहुमी ने अपनी याचिका में बताया कि वह अगस्त 2010 से कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर, नैनीताल में संविदा आधार पर असिस्टेंट प्रोफेसर (कॉमर्स) के पद पर कार्यरत हैं। उनका कहना है कि वर्ष 2025 में जारी नियमितीकरण नियमों के तहत उन्हें नियमित किया जाना चाहिए था, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनकी दावेदारी पर विचार किए बिना 13 अप्रैल 2026 को उसी पद के लिए नया विज्ञापन जारी कर दिया।
वहीं, विश्वविद्यालय की ओर से अदालत में दलील दी गई कि याचिकाकर्ता का नियमितीकरण संबंधी दावा पहले ही 3 मई 2025 के आदेश के तहत खारिज किया जा चुका है, इसलिए वर्तमान याचिका का कोई आधार नहीं बनता। इसके जवाब में याचिकाकर्ता पक्ष ने तर्क दिया कि पूर्व में लिया गया निर्णय उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 के तहत था, जबकि वर्तमान दावा दिसंबर 2025 में जारी नए नियमितीकरण नियमों के आधार पर किया गया है, जो एक अलग और स्वतंत्र आधार प्रस्तुत करता है।
मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान माना कि नए नियमों के तहत याचिकाकर्ता के दावे पर अब तक विचार नहीं किया गया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पूर्व में पारित आदेश नए नियमों के अंतर्गत दायर दावे को स्वतः निरस्त नहीं करता।
हाईकोर्ट ने निर्देश देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता दो सप्ताह के भीतर अपना नया प्रतिवेदन प्रस्तुत करें, जिसके बाद कुमाऊं विश्वविद्यालय को 5 दिसंबर 2025 की अधिसूचना के अनुसार चार सप्ताह के भीतर निर्णय लेना होगा। साथ ही, अदालत ने यह भी कहा कि यदि इस दौरान विज्ञापन के आधार पर कोई नियुक्ति की जाती है, तो वह अंतिम निर्णय के अधीन होगी और नियुक्ति आदेश में इस शर्त का स्पष्ट उल्लेख करना अनिवार्य होगा।
इस आदेश के बाद अब कुमाऊं विश्वविद्यालय प्रशासन पर तय समयसीमा के भीतर निर्णय लेने का दबाव बढ़ गया है, जबकि यह मामला प्रदेश में संविदा कर्मियों के नियमितीकरण को लेकर भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनता जा रहा है।