बड़ी खबरः सुप्रीम कोर्ट में अभद्र व्यवहार पर भड़का SCBA! कहा- न्यायपालिका की गरिमा से कोई समझौता नहीं, वीडियो रिकॉर्डिंग और सोशल मीडिया प्रसारण के लिए सख्त गाइडलाइन की मांग

Big News: SCBA outraged over unruly behavior in the Supreme Court! Declares there will be no compromise on the dignity of the judiciary; demands strict guidelines for video recording and social media

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को न्यायिक कार्यवाही के दौरान हुई एक अभूतपूर्व घटना ने देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था की गरिमा और अदालतों की कार्यवाही को लेकर नई बहस छेड़ दी है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अदालत के समक्ष एक वादी द्वारा किए गए कथित अभद्र और अपमानजनक व्यवहार की तीखी निंदा की है। एसोसिएशन ने स्पष्ट कहा कि न्यायालय के भीतर किसी भी प्रकार की अशोभनीय भाषा, धमकी या व्यवधान न केवल अदालत की गरिमा के खिलाफ है, बल्कि यह कानून के शासन और लोकतांत्रिक न्याय व्यवस्था पर भी सीधा प्रहार है। एससीबीए ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि यह घटना न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान हुई। बार एसोसिएशन के अनुसार, सुनवाई के दौरान संबंधित पक्षकार का व्यवहार पूरी तरह अस्वीकार्य था और इस तरह की घटनाओं को किसी भी स्थिति में सामान्य नहीं माना जा सकता। बार एसोसिएशन ने अपने बयान में कहा कि न्यायालय केवल विवादों के समाधान का मंच नहीं है, बल्कि यह संविधान और कानून के शासन का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसलिए अदालत की गरिमा और मर्यादा बनाए रखना प्रत्येक नागरिक, वकील, पक्षकार और अन्य संबंधित व्यक्तियों की जिम्मेदारी है। एससीबीए ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायपालिका पर जनता का विश्वास उसकी निष्पक्षता, स्वतंत्रता और गरिमापूर्ण कार्यप्रणाली पर आधारित होता है। यदि अदालतों के भीतर अनुशासन भंग करने वाली घटनाओं को गंभीरता से नहीं लिया गया तो इससे न्याय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कमजोर हो सकता है।

वीडियो रिकॉर्डिंग और सोशल मीडिया को लेकर नई चिंता
इस घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने अदालत की कार्यवाही की वीडियो रिकॉर्डिंग और उसके सोशल मीडिया पर प्रसार को लेकर भी चिंता जताई है। एसोसिएशन का कहना है कि वर्तमान समय में अदालतों की कार्यवाही के वीडियो या उनके संपादित (एडिटेड) हिस्से तेजी से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसारित किए जाते हैं। कई बार इन वीडियो को संदर्भ से हटाकर प्रस्तुत किया जाता है, जिससे वास्तविक तथ्यों की गलत तस्वीर सामने आती है। एससीबीए का मानना है कि ऐसी परिस्थितियों में न्यायपालिका की छवि प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है। लोगों तक अधूरी या भ्रामक जानकारी पहुंचने से न्यायिक प्रक्रिया को लेकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है और अदालतों के प्रति जनता का विश्वास भी प्रभावित हो सकता है।

गाइडलाइन बनाने की मांग
बार एसोसिएशन ने अदालत की रिकॉर्डिंग, वीडियो क्लिपिंग, एडिटिंग और सोशल मीडिया पर प्रसारण के संबंध में विस्तृत दिशा-निर्देश (गाइडलाइन) तैयार करने की मांग की है। एसोसिएशन का कहना है कि स्पष्ट नियम बनने से कोर्टरूम की रिकॉर्डिंग के दुरुपयोग पर रोक लगाई जा सकेगी और न्यायिक संस्थानों की गरिमा सुरक्षित रहेगी। एससीबीए ने यह भी कहा कि तकनीक के बढ़ते उपयोग के दौर में अदालत की कार्यवाही को सार्वजनिक करने के लिए पारदर्शिता और जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। इसलिए रिकॉर्डिंग के उपयोग और प्रसारण के लिए स्पष्ट कानूनी ढांचा तैयार किया जाना चाहिए। एसोसिएशन ने केंद्र सरकार से भी इस मामले में आवश्यक कदम उठाने का अनुरोध किया है। एससीबीए ने मांग की है कि ऐसे वीडियो, क्लिप या संपादित सामग्री जिनका उद्देश्य न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाना या अदालतों के प्रति जनता का विश्वास कमजोर करना हो, उन्हें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से हटाने के लिए कानून के अनुरूप प्रभावी प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई की जाए। एसोसिएशन का कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर तेजी से फैलने वाली भ्रामक सामग्री न केवल न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकती है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकती है। इसलिए सरकार, न्यायपालिका और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता है।