Sep 16, 2026 Login

बड़ी खबरः 86 साल से अटकी किशाऊ बांध परियोजना को मिली बड़ी रफ्तार! छह राज्यों के बीच हुआ एमओयू, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर प्रस्तावित है परियोजना

Big News: Kishau Dam project, stalled for 86 years, gains major momentum! MoU signed among six states; the project is proposed on the border of Uttarakhand and Himachal Pradesh.

देहरादून। आजादी से पहले वर्ष 1940 में जिस महत्वाकांक्षी किशाऊ बांध परियोजना की परिकल्पना की गई थी, करीब 86 साल बाद उसके धरातल पर उतरने की उम्मीद मजबूत हो गई है। मंगलवार, 15 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में छह राज्यों के बीच किशाऊ बांध परियोजना को लेकर समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए। इस महत्वपूर्ण अवसर पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी समेत संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री मौजूद रहे। एमओयू के बाद अब परियोजना को अंतिम मंजूरी के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष रखा जाएगा। किशाऊ बांध परियोजना उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर टौंस नदी पर प्रस्तावित है। टौंस यमुना की प्रमुख सहायक नदी है। करीब 15,624 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना के पूरा होने के बाद बिजली उत्पादन, सिंचाई और जल उपलब्धता के क्षेत्र में बड़े बदलाव की उम्मीद है। परियोजना के तहत करीब 236 मीटर ऊंचे बांध का निर्माण प्रस्तावित है। इससे लगभग 1324 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी उपलब्ध होने का अनुमान है, जबकि करीब 97 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जा सकेगी। परियोजना का लाभ सीधे तौर पर उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा को मिलेगा। बिजली उत्पादन में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की हिस्सेदारी 50-50 प्रतिशत निर्धारित की गई है। हालांकि परियोजना के बिजली उत्पादन को लेकर उपलब्ध विवरणों में पहले 660 मेगावाट की संभावना का उल्लेख रहा है, जबकि वर्तमान प्रस्ताव के अनुसार निर्माण पूरा होने पर करीब 422 मेगावाट बिजली उत्पादन की बात कही गई है।

86 साल तक क्यों अटकी रही परियोजना?
किशाऊ परियोजना की कवायद वर्ष 1940 में शुरू हुई थी। वर्ष 1944-45 में तत्कालीन पंजाब सरकार ने परियोजना स्थल का सर्वेक्षण कराया, लेकिन 1946 में विभिन्न कारणों से यह काम रोक दिया गया। इसके बाद करीब 16 साल तक परियोजना ठंडे बस्ते में रही। वर्ष 1962 में उत्तर प्रदेश सरकार ने दोबारा सर्वेक्षण शुरू कराया और 1964-65 में प्राथमिक परियोजना रिपोर्ट तैयार की गई। वर्ष 1996 में पहली विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार हुई, लेकिन पर्यावरणीय आपत्तियों और अन्य तकनीकी कारणों से परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। वर्ष 2008 में इसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया, बावजूद इसके पानी के बंटवारे, लागत वहन और राज्यों के बीच सहमति जैसे मुद्दे लगातार अड़चन बने रहे। वर्ष 2014 में हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बीच सहमति बनी और जून 2015 में दोनों राज्यों के बीच अनुबंध हुआ। वर्ष 2017 में दोनों राज्यों के संयुक्त उपक्रम के रूप में किशाऊ कॉरपोरेशन लिमिटेड का गठन किया गया। वर्ष 2018 में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से मंजूरी भी मिली, लेकिन परियोजना की रफ्तार अपेक्षित रूप से नहीं बढ़ सकी।

लागत और हिस्सेदारी बनी सबसे बड़ी अड़चन
परियोजना की शुरुआती अनुमानित लागत करीब 7 हजार करोड़ रुपये थी, जो अब बढ़कर 15,624 करोड़ रुपये से अधिक हो चुकी है। हिमाचल प्रदेश का तर्क था कि बांध हिमाचल की जमीन और टौंस नदी पर बनना है, इसलिए पावर कंपोनेंट की लागत का भार उन राज्यों को उठाना चाहिए, जिन्हें पानी का लाभ मिलेगा। हिमाचल की ओर से करीब 800 करोड़ रुपये के अंशदान को लेकर भी सहमति नहीं बन पा रही थी। इस गतिरोध को दूर करने के लिए 16 जून 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री और केंद्रीय ऊर्जा मंत्री की मौजूदगी में छह राज्यों के बीच बैठक हुई। बैठक में जल घटक के कार्य के लिए 90 प्रतिशत केंद्रीय सहायता और शेष 10 प्रतिशत राशि राज्यों की ओर से वहन करने पर सहमति बनी। इसके बाद परियोजना को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हुआ और अब 15 सितंबर को छह राज्यों ने एमओयू पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।

17 गांवों के करीब 5 हजार लोग होंगे प्रभावित
परियोजना के निर्माण के लिए करीब 17 गांवों के लगभग 5 हजार लोगों का विस्थापन करना पड़ेगा। ऐसे में परियोजना के साथ पुनर्वास और पुनर्स्थापन भी एक बड़ी चुनौती होगी। सरकार के सामने प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, मुआवजा और अन्य व्यवस्थाओं को प्रभावी तरीके से लागू करने की जिम्मेदारी होगी। संशोधित डीपीआर वर्ष 2025 में तैयार हो चुकी है। केंद्र सरकार की पहल के बाद वर्ष 2026 में परियोजना को लेकर लगातार समीक्षा बैठकों का दौर चला। अब छह राज्यों के बीच एमओयू होने के बाद परियोजना को अंतिम मंजूरी के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष रखा जाएगा। इसके बाद निर्माण कार्य की औपचारिक प्रक्रिया आगे बढ़ने की उम्मीद है। लगभग नौ दशक से अधिक समय से लंबित इस परियोजना के लिए यह समझौता एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।