बागेश्वर: बखेत गांव में खिसकती जमीन बनी खतरा! माइंस के बीच जिंदगी गुजार रहे 30 लोग, बारिश में घरों में घुस रहा पानी
बागेश्वर। उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के कांडा क्षेत्र में बारिश के बीच खनन प्रभावित बखेत गांव के लोगों की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। गांव में करीब 30 लोग वर्षों से माइंस के बीच जान जोखिम में डालकर रहने को मजबूर हैं। बरसात के दौरान जमीन खिसकने और घरों में पानी घुसने की समस्या ने ग्रामीणों की चिंता और बढ़ा दी है। ग्रामीणों का कहना है कि कई मकान कमजोर हो चुके हैं और किसी भी समय बड़ा हादसा हो सकता है। ग्रामीणों के मुताबिक, बखेत गांव की आबादी के दोनों ओर माइंस होने के कारण जमीन लगातार अस्थिर होती जा रही है। बारिश होते ही घरों के अंदर पानी घुस जाता है। कई मकानों की छतें टपक रही हैं। हालात यह हैं कि परिवारों को घर के अंदर पानी जमा करने के लिए बर्तन रखने पड़ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि एक तरफ घर के भीतर से पानी आता है तो दूसरी ओर छत से पानी टपकता रहता है। सबसे ज्यादा चिंता मंजू देवी के परिवार को लेकर जताई जा रही है। ग्रामीणों के अनुसार, उनके घर में पांच बच्चे हैं और मकान की दीवारों से पत्थर गिरने लगे हैं। आंगन की स्थिति भी खराब है। परिवार के लिए पर्याप्त शौचालय सुविधा नहीं होने से परेशानियां और बढ़ गई हैं। ऐसे में बरसात के दौरान बच्चों की सुरक्षा को लेकर परिजन चिंतित हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जमीन खिसकने की समस्या वर्षों पुरानी है। वे लंबे समय से सुरक्षित स्थान पर विस्थापन की मांग कर रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। बरसात में हर दिन परिवारों को किसी अनहोनी का डर सताता रहता है। ग्रामीणों ने जिला खनिज फाउंडेशन यानी DMF के फंड के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जब खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास और लोगों की सुरक्षा के लिए करोड़ों रुपये उपलब्ध हैं, तो बखेत के प्रभावित परिवारों के पुनर्वास में इसका इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा है। ग्रामीणों ने प्रशासन से मौके का स्थलीय निरीक्षण कराकर जमीन और मकानों की स्थिति का आकलन कराने तथा जल्द सुरक्षित स्थान पर विस्थापन की मांग की है। वहीं, जिलाधिकारी अपूर्वा पांडेय ने मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा है कि संवेदनशील क्षेत्र में टीम भेजकर स्थिति की जांच कराई जाएगी। जांच रिपोर्ट के आधार पर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। अब ग्रामीणों को प्रशासन की जांच और उसके बाद होने वाली कार्रवाई का इंतजार है।