Sep 06, 2026 Login

नैनीताल/ज्योलीकोट: जलजनित जानलेवा बीमारी से एक परिवार का इकलौता चिराग बुझा,दो बच्चियों ने खोई मां,पूर्व में चेताया था ग्रामीणों ने,स्कूल तक हुए थे बंद,कई मरीज पहुंचे थे अस्पताल,जिम्मेदार विभाग पर कार्रवाई की मांग

Nainital: A waterborne illness has turned fatal in Jyolikot; a family has lost its only son, and two young girls have lost their mother. Villagers had issued prior warnings, and schools were even shu

ज्योलीकोट में दूषित पानी का संकट जानलेवा, पीलिया से दो मौतें; पहले ही ग्रामीणों ने दी थी चेतावनी! एक परिवार का इकलौता बेटा बुझा, दो मासूम बेटियों से उठा मां का साया; तीन महीने से बीमारी की मार के बीच पेयजल व्यवस्था पर गंभीर सवाल !

नैनीताल/ज्योलीकोट। नैनीताल से सटे ज्योलीकोट क्षेत्र में लंबे समय से जारी जलजनित बीमारी ने अब दो जिंदगियां लील ली हैं। शनिवार देर शाम सरियाताल निवासी 16 वर्षीय रितेश जीना और ज्योलीकोट की 26 वर्षीय विवाहिता नीमा जोशी की उपचार के दौरान मौत हो गई। रितेश परिवार का इकलौता बेटा था, जबकि नीमा की दो मासूम बेटियां हैं, जिनकी उम्र चार वर्ष और डेढ़ वर्ष है। नीमा के परिवार के पांच अन्य सदस्यों के भी पीलिया से पीड़ित होने की जानकारी सामने आई है। लगातार डायरिया, उल्टी-दस्त, टायफाइड और अब पीलिया के गंभीर मामलों के बाद हुई इन दो मौतों ने पूरे क्षेत्र में दहशत के साथ-साथ प्रशासन और पेयजल व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाले विभागों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

दरअसल, ज्योलीकोट और आसपास के गांवों में बीमारी का सिलसिला अचानक शुरू नहीं हुआ। जून से ही लोगों के बीमार पड़ने की शिकायतें सामने आने लगी थीं। शुरुआत में डायरिया, उल्टी-दस्त और पेट संबंधी बीमारियों के मामले सामने आए और बाद में टायफाइड तथा पीलिया के मरीजों की संख्या बढ़ने लगी। बीते मंगलवार को स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी थी कि ग्रामीणों को सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करना पड़ा।

गांजा स्थित पीएचसी में सोमवार को ही पेट संबंधी बीमारी की शिकायत लेकर करीब 110 लोगों के जांच कराने की बात सामने आई थी। ग्रामीणों का आरोप था कि उन्हें लंबे समय से दूषित पेयजल की आपूर्ति हो रही है और इसी के चलते क्षेत्र में बीमारी फैल रही है।

बीमारी का दायरा ज्योलीकोट तक सीमित नहीं बताया गया। कृष्णापुर, दुर्गापुर, वीरभट्टी, गांजा, छिंडां मल्ला, बगरीखोड़, छिंडां तल्ला, वर्गोंमोंट, छीड़ा, सरियाताल, तल्ला बेलुवाखान, मल्ला बेलुवाखान और देवलडूंगा समेत कई गांवों के ग्रामीणों ने भी दूषित पानी की शिकायत की थी। ग्रामीणों का कहना था कि पीलिया, टायफाइड, डायरिया, उल्टी, बुखार और दस्त जैसी बीमारियों से बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हैं और कई मरीज अलग-अलग अस्पतालों में उपचार करा रहे हैं।

 

मामले ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब पेयजल की गुणवत्ता को लेकर जांच के दौरान पानी में सीवेज के मिश्रण की शिकायत सामने आई। ग्रामीणों ने आशंका जताई कि कई क्षेत्रों में पानी की सप्लाई दुर्गापुर जलस्रोत से होती है और इसके आसपास मौजूद सीवर टैंक की लीकेज के कारण पेयजल दूषित हो रहा है।

यदि पेयजल में सीवेज का मिश्रण होने की आशंका सामने आई थी, तो यह सवाल भी उठना स्वाभाविक है कि जलस्रोत से लेकर घरों तक पहुंचने वाली पूरी सप्लाई व्यवस्था की निगरानी किस स्तर पर की जा रही थी और बीमारी के शुरुआती मामलों के सामने आने के बाद इस संभावित स्रोत को तत्काल खत्म क्यों नहीं किया गया?

 

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए जनहित और छात्रहित में ज्योलीकोट क्षेत्र के पांच सरकारी और निजी स्कूलों में एक से तीन सितंबर तक अवकाश घोषित करना पड़ा। यानी प्रशासन के स्तर पर भी बीमारी के फैलाव को सामान्य स्थिति नहीं माना गया। दूसरी ओर, ग्रामीणों का विरोध भी जारी रहा और उन्होंने नैनीताल-दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग पर धरना देकर दूषित पेयजल की समस्या के स्थायी समाधान की मांग उठाई। ग्रामीणों का कहना था कि लगातार शिकायतों के बावजूद उन्हें सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए स्थायी व्यवस्था नहीं की जा रही है।

 

विवाद बढ़ने के बाद जल संस्थान ने पेयजल और सीवर लाइनों की जांच कर उन्हें अलग करने का काम शुरू किया। विभाग की ओर से पानी की टंकियों की सफाई और क्लोरीनेशन कराया गया। जल संस्थान के ईई अनीश पिल्लई के अनुसार विभाग ने टीमें गठित कीं और घर-घर जाकर पानी की टंकियों में भी क्लोरीन का छिड़काव किया जा रहा है। यह कार्रवाई बीमारी की रोकथाम के लिहाज से जरूरी है, लेकिन अब दो मौतों के बाद सवाल यह है कि क्या यह कदम समस्या की जड़ तक पहुंचने के लिए पर्याप्त है?

 

जिस बीमारी की शुरुआत कई सप्ताह पहले हुई, उसमें लगातार अलग-अलग लक्षण सामने आते रहे और अब गंभीर पीलिया के मामले मौतों तक पहुंच गए हैं। ऐसे में सिर्फ क्लोरीनेशन, टंकियों की सफाई और मरीजों की निगरानी से आगे बढ़कर यह पता लगाना जरूरी है कि आखिर दूषित पानी का स्रोत क्या है। यदि सीवर लीकेज के कारण पेयजल दूषित हुआ है तो उस लीकेज को स्थायी रूप से ठीक करने की जिम्मेदारी किसकी है? पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच क्यों नहीं हुई? और यदि जांच में दूषित पानी की पुष्टि होती है तो इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार विभाग और अधिकारियों की जवाबदेही कैसे तय होगी?

इसी बिंदु पर अब स्वास्थ्य विभाग के साथ-साथ पेयजल व्यवस्था से जुड़े विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। स्वास्थ्य विभाग का काम मरीजों की पहचान, उपचार और बीमारी की निगरानी करना है, लेकिन लोगों के घरों तक सुरक्षित पेयजल पहुंचाना और जलस्रोत तथा पाइपलाइन को प्रदूषण से बचाना संबंधित विभाग की मूल जिम्मेदारी है। इसलिए बीमारी के कारणों की जांच में केवल मरीजों का मेडिकल सर्वे पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि पानी के स्रोत, सीवर लाइन, पाइपलाइन, टंकियों और सप्लाई नेटवर्क की भी वैज्ञानिक जांच जरूरी है।

 

ब्लॉक प्रमुख डॉ. हरीश बिष्ट ने भी बीमारी के लंबे समय से जारी रहने पर चिंता जताई है। अब स्वास्थ्य विभाग ने क्षेत्र में अलर्ट जारी कर निगरानी बढ़ा दी है। आशा कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर लोगों के स्वास्थ्य की जानकारी लेने और संदिग्ध मरीजों की तत्काल सूचना देने के निर्देश दिए गए हैं। लेकिन दो मौतों के बाद ग्रामीणों की चिंता केवल यह नहीं है कि अगला मरीज कौन होगा, बल्कि यह है कि बीमारी का मूल कारण कब खत्म होगा।

एक तरफ 16 वर्षीय रितेश के परिवार ने अपना इकलौता बेटा खो दिया, दूसरी तरफ नीमा की दो छोटी बेटियां मां के साये से वंचित हो गईं। ऐसे में अब यह मामला केवल बीमारी फैलने या स्वास्थ्य विभाग की निगरानी तक सीमित नहीं रह गया है। यदि दूषित पेयजल इस बीमारी की वजह साबित होता है तो पानी की सप्लाई व्यवस्था की जवाबदेही तय करना और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो, इसकी स्थायी व्यवस्था करना प्रशासन की सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। ग्रामीणों की पुरानी शिकायतों के बाद अब हुई दो मौतें इस बात का संकेत हैं कि चेतावनी को समय रहते गंभीरता से लेना कितना जरूरी था।