Aug 22, 2026 Login

सड़क के बिना जिंदगी से जंगः उत्तरकाशी में बीमार महिला को 11 किमी डंडी-कंडी के सहारे लेकर चले ग्रामीण! दस साल बाद भी नहीं पहुंच पाई सड़क

A struggle for survival without a road: Villagers in Uttarkashi carried a sick woman on a pole for 11 km! Ten years later, the road still hasn't arrived.

उत्तरकाशी। उत्तरकाशी जिले के मोरी विकासखंड से एक बार फिर पहाड़ की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था और सड़क संपर्क की हकीकत सामने आई है। हिमाचल प्रदेश की सीमा से सटे सेवा गांव में एक बीमार महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को डंडी-कंडी का सहारा लेना पड़ा। महिला की हालत गंभीर होने पर ग्रामीणों ने उसे कंधों पर उठाकर करीब 11 किलोमीटर का खतरनाक पैदल सफर तय किया और सड़क तक पहुंचाया। इसके बाद वाहन के जरिए महिला को मोरी अस्पताल ले जाया गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें हायर सेंटर रेफर कर दिया गया। घटना ने एक बार फिर पहाड़ों में बुनियादी सुविधाओं की कमी और प्रशासनिक दावों की पोल खोल दी है। ग्रामीणों का कहना है कि सेवा गांव के लिए करीब दस वर्ष पहले धौला से सड़क निर्माण कार्य शुरू किया गया था, लेकिन आज तक सड़क गांव तक नहीं पहुंच सकी। सड़क अधूरी होने के कारण गांव के लोग आज भी स्वास्थ्य, शिक्षा और जरूरी सुविधाओं के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं। गांव निवासी जगदीप फौजियान के अनुसार, मंगलवार को 56 वर्षीय खंतरा देवी की अचानक तबीयत बिगड़ गई। उन्हें तेज बुखार, उल्टी-दस्त और गंभीर कमजोरी की शिकायत थी। हालत इतनी खराब हो गई कि उनके पैरों ने काम करना बंद कर दिया। गांव में स्वास्थ्य सुविधा नहीं होने और सड़क संपर्क न होने के कारण ग्रामीणों के सामने उन्हें अस्पताल पहुंचाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई। इसके बाद गांव के लोगों ने तुरंत डंडी-कंडी तैयार की और महिला को उसमें बैठाकर धौला तक पैदल ले जाने का निर्णय लिया। ग्रामीणों ने महिला को बारी-बारी से कंधों पर उठाया और करीब 11 किलोमीटर लंबा कठिन सफर तय किया।

बताया जा रहा है कि सेवा से धौला तक का रास्ता बेहद दुर्गम है। संकरी पगडंडियां, खड़ी चढ़ाई और गहरी खाइयों के बीच यह सफर किसी जोखिम से कम नहीं था। कई जगह रास्ता इतना संकरा है कि थोड़ी सी चूक भी जानलेवा साबित हो सकती है। ग्रामीणों ने बताया कि यह कोई पहली घटना नहीं है। गांव में जब भी कोई बीमार पड़ता है या गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाना होता है, तब डंडी-कंडी ही एकमात्र सहारा बनती है। कई बार गंभीर मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं, लेकिन वर्षों से हालात जस के तस बने हुए हैं। बरसात के मौसम में स्थिति और भयावह हो जाती है, जब गांव का संपर्क पूरी तरह कट जाता है और लोग कई दिनों तक बाहरी दुनिया से अलग-थलग पड़ जाते हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि सड़क निर्माण को लेकर कई बार मांग उठाई गई, लेकिन जिम्मेदार विभाग और प्रशासन ने केवल आश्वासन दिए। करीब दस साल पहले धौला से सेवा गांव तक सड़क निर्माण शुरू किया गया था, जिससे ग्रामीणों को उम्मीद जगी थी कि अब उनकी जिंदगी आसान होगी, लेकिन निर्माण कार्य धीमी गति और लापरवाही की भेंट चढ़ गया। आज भी गांव तक सड़क नहीं पहुंच पाई है और लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क न होने का असर केवल स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों की पढ़ाई, रोजगार और रोजमर्रा की जरूरतों पर भी पड़ रहा है।

आपात स्थिति में मरीजों को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सकता, जिससे कई बार जान तक चली जाती है। गांव के बुजुर्गों और महिलाओं को सबसे अधिक परेशानी झेलनी पड़ती है। वहीं पीएमजीएसवाई के सहायक अभियंता सुभाष दौरियाल ने बताया कि सेवा गांव के लिए सड़क निर्माण कार्य जारी है और विभाग जल्द से जल्द इसे पूरा करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि वे पिछले कई वर्षों से ऐसे ही आश्वासन सुनते आ रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात अब भी नहीं बदले हैं। फिलहाल इस घटना ने पहाड़ों में विकास की वास्तविक तस्वीर को उजागर कर दिया है। एक ओर सरकार ग्रामीण क्षेत्रों तक सड़क, स्वास्थ्य और आपात सेवाएं पहुंचाने के दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर आज भी कई गांव ऐसे हैं जहां बीमारों को अस्पताल पहुंचाने के लिए लोगों को कंधों का सहारा लेना पड़ता है। सेवा गांव की यह घटना एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि आखिर पहाड़ के लोगों को बुनियादी सुविधाओं के लिए कब तक संघर्ष करना पड़ेगा।