मां ने मोबाइल देने से किया मना तो नाराज़ 17 वर्षीय छात्र ने गौला पुल से लगाई छलांग! अगले दिन मिला शव
हल्द्वानी। एक मामूली पारिवारिक असहमति ने ऐसा दुखद मोड़ ले लिया, जिसने पूरे समाज के सामने किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक संवेदनशीलता को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। गौला पुल से नदी में छलांग लगाने वाले 17 वर्षीय छात्र का शव बीते रोज एसडीआरएफ के गोताखोरों और बनभूलपुरा पुलिस ने बरामद कर लिया। मृतक की पहचान प्रियांश बिष्ट निवासी हाथीखाल, मोतीनगर, बरेली रोड के रूप में हुई है। जानकारी के अनुसार प्रियांश कक्षा 12 का छात्र था और मोतीनगर इंटर कॉलेज में अध्ययनरत था। उसके पिता गोविंद सिंह बिष्ट मोटर मैकेनिक हैं और परिवार में माता-पिता के अलावा एक छोटी बहन भी है।
बताया जा रहा है कि रविवार दोपहर प्रियांश को पेंटिंग का बहुत शौक था और उसे पेंटिंग से संबंधित ही कुछ सामान लेने बाजार जाना था। इस दौरान उसने अपनी मां से मोबाइल फोन मांगा, लेकिन मां ने मोबाइल देने से इनकार करते हुए उसे स्कूटी से जाने और बहन को भी साथ ले जाने की सलाह दी। मोबाइल न मिलने की बात से प्रियांश आहत और नाराज हो गया। वह अकेले साइकिल लेकर घर से निकल गया। बताया जा रहा है कि प्रियांशु ने अपनी साइकिल गोरापड़ाव क्षेत्र में खड़ी की और वहां से टेंपो के जरिए हल्द्वानी-चोरगलिया मार्ग स्थित गौला पुल पहुंचा। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि वह कुछ समय तक पुल के आसपास टहलता रहा और फिर अचानक रेलिंग पर चढ़कर नदी में छलांग लगा दी। मौके पर मौजूद लोगों ने उसे रोकने का प्रयास करते हुए शोर भी मचाया, लेकिन तब तक वह नदी में कूद चुका था।
सूचना मिलने पर बनभूलपुरा पुलिस तत्काल मौके पर पहुंची। निजी गोताखोरों के साथ एसडीआरएफ की टीम ने देर रात तक सर्च अभियान चलाया, लेकिन सफलता नहीं मिल सकी। सोमवार सुबह दोबारा तलाशी अभियान शुरू किया गया, जिसके बाद एसडीआरएफ के गोताखोरों ने नदी से शव बरामद कर लिया। पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया। यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक परिवेश में किशोरों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती चुनौतियों की ओर भी संकेत करती है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि किशोरावस्था में भावनाएं अत्यंत तीव्र होती हैं और कई बार क्षणिक आवेश, अस्वीकार किए जाने की भावना या संवाद की कमी गंभीर निर्णयों का कारण बन सकती है। ऐसे समय में परिवारों के लिए आवश्यक है कि वे बच्चों के व्यवहार में आने वाले बदलावों को समझें, उनकी भावनाओं को महत्व दें और उनके साथ खुला संवाद बनाए रखें।
प्रियांश की असमय मौत ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि छोटी लगने वाली बातों के पीछे कभी-कभी गहरी भावनात्मक पीड़ा भी छिपी हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों और किशोरों के साथ संवेदनशील संवाद, भावनात्मक सहयोग और समय पर परामर्श ऐसी घटनाओं को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।