उफनती नदी में जिंदगी की जंग: पुल-सड़क नहीं होने पर गर्भवती को कंधे पर बैठाकर ग्रामीणों ने पार कराई नदी, जच्चा-बच्चा सुरक्षित

A battle for life in a surging river: With no bridge or road available, villagers carried a pregnant woman across the river on their shoulders; both mother and baby are safe.

रांची। झारखंड के खूंटी जिले से मानवता और साहस की एक ऐसी मिसाल सामने आई है, जिसने न सिर्फ लोगों का दिल जीत लिया है बल्कि ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं के दावों की पोल भी खोल कर रख दी है। अड़की प्रखंड के सावमरांगबेड़ा गांव में प्रसव पीड़ा से तड़प रही एक महिला के लिए जब उफनती नदी और टूटी कनेक्टिविटी काल बनने लगी, तो ग्रामीणों ने हिम्मत नहीं हारी। गांव के जांबाज युवाओं ने जान जोखिम में डालकर महिला को कंधे पर बैठाया और घुटनों से ऊपर तक बह रहे तेज बहाव के बीच पैदल ही पूरी नदी पार करा दी। इसके बाद महिला को अस्पताल पहुंचाया गया, जहां उसने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया।

यह दिल दहला देने वाली घटना रविवार की है। सावमरांगबेड़ा गांव की रहने वाली सोमवारी देवी को अचानक तेज प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। लगातार हो रही बारिश के कारण गांव के पास से गुजरने वाली करकरी नदी पूरे उफान पर थी। गांव में पक्की सड़क और नदी पर पुल न होने के कारण पूरा इलाका एक टापू में तब्दील हो चुका था। परिजनों ने एंबुलेंस को फोन तो किया, लेकिन नदी के दूसरी ओर मुख्य मार्ग पर ही एंबुलेंस खड़ी रही, क्योंकि गांव तक आने का कोई रास्ता नहीं था। समय तेजी से बीत रहा था और महिला की हालत बिगड़ती जा रही थी। ऐसे नाजुक समय में महिला के पति मांगूछाता नाग और गांव के अन्य युवकों ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने सोमवारी देवी को सहारा देकर अपने कंधे पर बैठाया और उफनती करकरी नदी के भीतर कदम रख दिए। पानी का बहाव बेहद तेज था और पैर उखड़ने का डर था, लेकिन जिंदगी बचाने की जिद के आगे नदी का रौद्र रूप भी हार गया। ग्रामीणों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़कर मानव श्रृंखला बनाई और सुरक्षित रूप से नदी पार कर महिला को एंबुलेंस तक पहुंचाया। नदी पार करने के बाद महिला को तुरंत अड़की सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। अस्पताल प्रबंधन भी इस आपात स्थिति को देखकर तुरंत एक्शन मोड में आ गया। प्रभारी चिकित्सक डॉ. निरुपमा लकड़ा की देखरेख में डॉक्टरों की टीम ने तुरंत महिला को लेबर रूम में शिफ्ट किया, जहां बिना किसी देरी के सुरक्षित प्रसव कराया गया। ड्यूटी पर तैनात डॉ. निपोलियन केरकेट्टा ने मेडिकल बुलेटिन जारी करते हुए बताया कि जच्चा और बच्चा दोनों पूरी तरह सुरक्षित और स्वस्थ हैं। प्राथमिक देखभाल के बाद दोनों की स्थिति बिल्कुल सामान्य है और सोमवार शाम तक उन्हें अस्पताल से छुट्टी देकर घर भेजा जा सकता है। इस सुखद अंत के बावजूद गांव के लोगों में प्रशासन के प्रति भारी आक्रोश है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यह समस्या कोई नई नहीं है, बल्कि हर साल मानसून के मौसम में उन्हें इसी नर्क से गुजरना पड़ता है। करकरी नदी पर पुल नहीं होने से सावमरांगबेड़ा गांव का संपर्क बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट जाता है। सबसे ज्यादा परेशानी गंभीर मरीजों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को होती है। कई बार समय पर अस्पताल न पहुंच पाने के कारण लोगों की जान पर बन आती है। तोड़ांग पंचायत के मुखिया मंसाय मुंडा ने भी अस्पताल पहुंचकर पीड़ित परिवार से मुलाकात की। उन्होंने व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि विधायक से लेकर जिला प्रशासन के आला अधिकारियों तक, इस पुल और सड़क के लिए दर्जनों बार लिखित गुहार लगाई जा चुकी है, लेकिन आज तक सिर्फ खोखले आश्वासन ही मिले हैं। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि इस बरसात के बाद भी पुल का निर्माण शुरू नहीं हुआ, तो वे उग्र आंदोलन को बाध्य होंगे।