उत्तराखंड:13 अप्रैल 1978 का काला दिन!पंतनगर में शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर बरसी गोलियां, मारे गए थे 14 मजदूर,आज भी अधूरा है न्याय

13 April 1978 Pantnagar Massacre: When Workers’ Protest Turned Into Bloodshed

उत्तराखंड के पंतनगर में 13 अप्रैल 1978 को हुआ गोलीकांड आज भी देश के श्रमिक आंदोलनों के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है। उस दिन श्रमिकों के विरोध को दबाने के लिए पुलिस द्वारा की गई फायरिंग में आधिकारिक तौर पर 14 मजदूरों की मौत हुई थी, जबकि कई अन्य गंभीर रूप से घायल हुए थे। यह घटना न केवल पंतनगर विश्वविद्यालय बल्कि पूरे देश के सार्वजनिक उपक्रमों में श्रमिक अधिकारों की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

1960 में स्थापित पंतनगर विश्वविद्यालय देश का पहला कृषि विश्वविद्यालय था, लेकिन 1970 के दशक के अंत तक यहां कार्यरत अस्थायी मजदूर बेहद कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन कर रहे थे। उन्हें न तो पर्याप्त सुविधाएं मिल रही थीं और न ही उनके अधिकारों की सुनवाई हो रही थी। अधिकांश मजदूर पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से आए हुए थे, जो शोषण और असुरक्षा के माहौल में काम कर रहे थे। इसी पृष्ठभूमि में 1977 में “पंतनगर कर्मचारी संगठन” का गठन हुआ, जिसने मजदूरों की आवाज को संगठित रूप से उठाना शुरू किया। संगठन के नेतृत्व में मजदूरों ने छंटनी, निलंबन और तबादलों के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। प्रशासन ने इसके जवाब में सख्ती दिखाते हुए परिसर में धारा 144 लागू कर दी और हड़ताल पर रोक लगाने के लिए एस्मा तक लागू कर दिया। 13 अप्रैल 1978 को झा कॉलोनी मंदिर परिसर में सभा के बाद जब मजदूर जुलूस निकालने की तैयारी कर रहे थे, तभी पुलिस और पीएसी के जवानों ने उन्हें रोक लिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, पहले हवा में फायरिंग की गई और फिर अचानक गोलियों की बौछार शुरू हो गई। निहत्थे मजदूरों पर की गई इस कार्रवाई में कई लोग मौके पर ही गिर पड़े, जबकि जान बचाकर भागने वालों का पीछा कर भी गोली चलाई गई। इस घटना ने पूरे विश्वविद्यालय को झकझोर कर रख दिया। बाद में छात्रों और शिक्षकों ने भी प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और मजदूरों के समर्थन में सड़कों पर उतर आए।गोलीकांड के बाद केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय और मानवाधिकार आयोग के दबाव में उत्तर प्रदेश सरकार ने मामले की जांच के आदेश दिए। श्रीवास्तव आयोग की जांच में यह सामने आया कि इस घटना के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ-साथ यूनियन की कुछ नीतियां भी जिम्मेदार थीं। आयोग ने पांच प्रमुख सुधारात्मक सिफारिशें की थीं, जिन्हें तत्काल लागू करने की बात कही गई थी। हालांकि, इस दर्दनाक घटना के 48 वर्ष बीत जाने के बावजूद आज तक उन सिफारिशों को पूरी तरह लागू नहीं किया गया है। पंतनगर गोलीकांड आज भी एक ऐसे सवाल के रूप में खड़ा है, जो यह पूछता है कि क्या देश में श्रमिकों के अधिकार और न्याय वास्तव में सुनिश्चित हो पाए हैं या नहीं।