क्या है FCRA? दिल्ली प्रोटेस्ट के बीच क्यों गर्माया FCRA का मुद्दा! NGO से लेकर ट्रस्ट तक, विदेशी फंडिंग का हर हिसाब सरकार के पास

What is FCRA? Why has the FCRA issue heated up amidst the Delhi protests? From NGOs to trusts, the government holds a complete record of all foreign funding.

नई दिल्ली। दिल्ली में पेपर लीक के विरोध में चल रहे छात्र आंदोलन के बीच विदेशी फंडिंग को लेकर नई बहस छिड़ गई है। प्रदर्शन से जुड़े कुछ संगठनों और गतिविधियों पर उठ रहे सवालों के बीच केंद्र सरकार के विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) की फिर से चर्चा होने लगी है। हालांकि किसी भी संगठन या व्यक्ति के खिलाफ विदेशी फंडिंग के आरोपों की पुष्टि संबंधित जांच एजेंसियों या सक्षम प्राधिकार द्वारा ही की जाती है, लेकिन इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर भारत में विदेशी धन के आगमन और उसके उपयोग पर निगरानी रखने वाला FCRA कानून क्या है, यह क्यों बनाया गया था और समय के साथ इसमें इतने बदलाव क्यों किए गए।

दरअसल, भारत में विदेशी चंदे और विदेशी स्रोतों से मिलने वाली आर्थिक सहायता को नियंत्रित करने वाला विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (Foreign Contribution Regulation Act-FCRA) केवल एनजीओ की फंडिंग तक सीमित कानून नहीं है, बल्कि इसे राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और सार्वजनिक जीवन में विदेशी प्रभाव को नियंत्रित करने वाले महत्वपूर्ण कानूनी ढांचे के रूप में देखा जाता है। बीते पांच दशकों में बदलती परिस्थितियों के अनुसार इस कानून में कई बार संशोधन किए गए हैं ताकि विदेशी धन के प्रवाह में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।

आपातकाल के बाद के राजनीतिक दौर में देश के नीति निर्माताओं के सामने यह चिंता उभरकर आई थी कि कहीं विदेशी सरकारें, एजेंसियां या संस्थाएं आर्थिक सहायता के जरिए भारत की राजनीति, सामाजिक आंदोलनों, मीडिया या अन्य सार्वजनिक संस्थानों को प्रभावित न करने लगें। इसी पृष्ठभूमि में संसद ने वर्ष 1976 में पहली बार विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम लागू किया। इसका उद्देश्य विदेशी सहायता पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि विदेशी धन का उपयोग भारत के राष्ट्रीय हितों के अनुरूप और पारदर्शी तरीके से हो।

इस कानून के तहत कोई भी पात्र संस्था, ट्रस्ट, सोसायटी या गैर-लाभकारी संगठन विदेशी अंशदान प्राप्त करने से पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय से पंजीकरण या पूर्व अनुमति लेने के लिए बाध्य होता है। कानून के प्रशासन, पंजीकरण, वार्षिक रिटर्न, निरीक्षण और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई की जिम्मेदारी भी गृह मंत्रालय के पास ही है। राजनीतिक दलों, चुनावी गतिविधियों, मीडिया, सरकारी संस्थाओं और सार्वजनिक नीति को प्रभावित करने वाले विदेशी वित्तीय हस्तक्षेप पर रोक लगाने के लिए भी इस कानून में स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं।

समय के साथ FCRA को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण संशोधन किए गए। वर्ष 1984 में विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले संगठनों के लिए पंजीकरण व्यवस्था को और मजबूत किया गया तथा कानून के दायरे का विस्तार किया गया। इसके बाद वर्ष 2010 में नया FCRA लागू किया गया, जिसने 1976 के कानून का स्थान लिया। इसमें प्रत्येक पांच वर्ष में पंजीकरण का नवीनीकरण अनिवार्य किया गया, साथ ही पंजीकरण रद्द करने, निलंबित करने, संपत्तियों के प्रबंधन और उल्लंघनों पर कार्रवाई से जुड़े विस्तृत प्रावधान जोड़े गए।

वर्ष 2020 का संशोधन सबसे अधिक चर्चा में रहा। इसके तहत विदेशी चंदा प्राप्त करने के लिए नई दिल्ली स्थित भारतीय स्टेट बैंक की निर्दिष्ट शाखा में एफसीआरए खाता खोलना अनिवार्य किया गया। पदाधिकारियों की पहचान के लिए आधार या पासपोर्ट जैसी व्यवस्था लागू की गई तथा एक संस्था द्वारा प्राप्त विदेशी अनुदान को दूसरी संस्था को हस्तांतरित करने पर रोक लगा दी गई। सरकार ने इन बदलावों को पारदर्शिता और धन के बेहतर निगरानी तंत्र के लिए आवश्यक बताया था। इसके बाद वर्ष 2022 में नियमों में संशोधन करते हुए विदेश में रहने वाले रिश्तेदारों से प्राप्त होने वाले धन के संबंध में सीमा बढ़ाई गई, जिससे आम परिवारों के लिए अनुपालन आसान हुआ। वहीं 2024 और 2025 के दौरान प्रक्रियागत बदलावों के जरिए आवेदन प्रणाली को अधिक सुव्यवस्थित करने, दस्तावेजी प्रक्रिया को मजबूत करने और प्रशासनिक व्यय से जुड़े कुछ प्रावधानों में व्यावहारिक राहत देने की दिशा में कदम उठाए गए।

अब वर्ष 2026 में प्रस्तावित संशोधनों पर भी चर्चा जारी है। प्रस्तावों के अनुसार, जिन संस्थाओं का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त या रद्द हो जाए, उनकी विदेशी अंशदान से निर्मित संपत्तियों के संरक्षण के लिए अलग व्यवस्था बनाने का विचार है। साथ ही धार्मिक गतिविधियों से जुड़े कुछ प्रावधानों में भी बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं। हालांकि ये संशोधन संसद से पारित होने और अधिसूचना जारी होने के बाद ही प्रभावी होंगे,लेकिन दिल्ली में चल रहे पेपर लीक प्रोटेस्ट में विदेशी फंडिंग की बहस ने इस मुद्दे को एक बार फिर हवा दे दी है। 

बता दें कि FCRA का मूल उद्देश्य विदेशी सहायता को रोकना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि देश में आने वाला विदेशी धन पारदर्शी तरीके से खर्च हो और उसका उपयोग भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था, सार्वजनिक संस्थाओं और राष्ट्रीय हितों को प्रभावित करने के लिए न किया जा सके। इसी वजह से यह कानून आज भी भारत की नियामक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।