उत्तराखंड:फिजूल खर्च बंद!शादी में शराब बंद,शगुन में एक रुपया,और टॉफी से होगा मुँह मीठा!नियम न मानने वाले पर 55 हजार का लगेगा जुर्माना!
पिथौरागढ़ के धारचूला में बसे रं समाज ने अपनी परम्पराओं को बचाने के लिए केएमवीएन सभागार में बैठक आयोजित कर कुछ अहम प्रस्ताव पारित किए है।

17 जनवरी को पन्ज्यूखु संस्कृति समिति द्वारा आयोजित बैठक की गई जिसमें रं समाज के उत्थान और इस समाज पर हावी होते पाश्चात्य संस्कृति को रोकने के लिए विचार विमर्श किया गया। बैठक में महत्वपूर्ण बिंदुओं पर निर्णय लिए गए जिनमे मुख्य रूप से ये निम्न बिंदु शामिल रहे।
1-अब दुल्हन की मेहंदी में मात्र महिलाएं, परिजन एवं बिरादरी के लोग ही शामिल होंगे। बाकी लोग विवाह के दिन ही शामिल रहेंगे।
2- रं समाज में दहेज प्रथा नहीं है। दुल्हन की सामूहिक विदाई होती है। अब रिश्तेदार दुल्हन को आवश्यक सामान के स्थान पर नकद राशि देंगे।
3- रं संस्कृति को संरक्षित करने के लिए पूर्व से बने 16 नियमों में व्यापक सुधार कर समारोह में व्यय को कम से कम किया जाएगा जिससे कि समाज में अमीर-गरीब के विवाह में समरूपता बनी रहे। दिखावे की संस्कृति को प्रोत्साहन नहीं मिलेगा।
4-सगाई में दूल्हा वधु पक्ष के बिरादरी को शगुन के रूप में एक-एक रुपये व मिष्ठान के रूप में टॉफियां देगा। शादी में शराब पूर्णरूप से बंद होगी।
5- दुल्हन के सहेलियों को संख्या के अनुसार पांच से तीन किलो मिठाई दी जाएगी।
6- माइति (दुल्हन के गांव) में दूल्हे द्वारा इष्ट देव पूजन में पितरों को बकरी से नहीं पूजा जाएगा।
7- विवाह में पारंपरिक कार्यक्रमों के दौरान डीजे या माइक नहीं बजाया जाएगा।
8- बहनों व मामा की ओर से बारात को रास्ते को पार्टी नहीं दी जाएगी और न ही शगुन दिया जाएगा।
बैठक में ये भी कहा गया कि रं समाज मे अमीर गरीब का भेदभाव न रहे इसके लिए भी नियम लागू किये जायेंगे।नियमों का पालन न करने वाले पर 55 हज़ार रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा।ये नियम बैठक के साथ ही 17 जनवरी से ही लागू कर दिए गए है।
बैठक में कृष्णा गर्ब्याल संरक्षक पन्ज्यूखु संस्कृति ने कहा कि रं समाज में पाश्चात्य संस्कृति की वजह से अंग्रेजी शराब का प्रचलन बढ़ता जा रहा है इसको पूरी तरह बैन किया जाएगा। बैठक में उन्होंने ने ये भी कहा कि जो संस्कृति हमारे पूर्वजों ने दी है उसके अनुसार ही चलेंगे।
वही समिति अध्यक्ष महिराज गर्ब्याल ने कहा कि रं विवाह कैलाश परंपरा के अनुसार सादगी से संपन्न होता है। वर्तमान में मेहंदी, हल्दी रस्म के नाम पर अंग्रेजी शराब परोसने की होड़ रहने लगी हैं। इससे युवा पीढ़ी अधिक प्रभावित हो रही है। उन्होंने कहा कि रं संस्कृति के संरक्षण के लिए दारमा, चौदास और व्यास घाटी के गांवों में जल्द ही बैठक की जाएगी।

आपको बता दें कि रं समाज की बसासत मुख्यत: पिथौरागढ़ जिले की धारचूला तहसील के ब्यांस, तल्ला दारमा, मल्ला दारमा और चौंदास पट्टी में है। उच्च हिमालयी क्षेत्र में व्यास घाटी-काली नदी, दारमा घाटी-धौली नदी और चौंदास घाटी-काली और धौला नदी के बीच में पसरा भू-भाग है। नेपाल और तिब्बत से सटे काली, गोरी और धौली नदी क्षेत्र की अधिकांश बसासत को शौका, जोहारी अथवा रं समाज के नाम से जाना जाता है।रं समाज में विवाह संस्कार ऐसा संस्कार है जिसमें पूरा गांव तथा रिश्तेदार लोग अपनी-अपनी तरफ से हर्ष-उल्लास व्यक्त करते हैं. शादी से पहले पूरे गांव में उत्सव सा माहौल रहता है, हर जगह से लोग सर्विस वाले, बकरी वाले, शिकार खेलने गये लोग दो-तीन दिन पहले ही गांव में पहुंच जाते हैं, और शादी की तैयारी में जुट जाते हैं. लड़के तथा पुरुष लोग पंतगे तथा स्वागतद्वार बनाने में जुट जाते हैं, जबकि स्त्रियां, रिश्तेदार लोग चावल, दाल छनने में, लड़कियां मिर्च अचार बनाने में जुट जाती हैं. शादी के कुछ दिन पहले घर के सभी लोगों के लिये नये कपड़े, आभूषण बनाये जाते हैं, फिर नाच-गाना चलता रहता है.

रं समाज में दहेज देने की प्रथा पहले भी कभी नहीं थी और न अब है, यही हमारे रं समाज का सकारात्मक पहलू है. जब लड़की आती है तो अपने साथ कपड़े, एक बिस्तर, एक फौला, एक बक्सा, आदि लेकर आती है. पहले जमाने में तकली (ऊन कातने) आसी (घास काटने) तथा ऊन रखने वाली टोकरी आदि दिया जाता था, हालांकि रं समाज में मां की मृत्यु के बाद उसके जेवर पर अधिकार लड़की को ही मिलता है न कि वधू को.
रं समाज में तलाक न के बराबर है. जिन मामलों में तलाक हुआ है वे या तो जिनकी शादी बचपन में ही उनके मां-बाप ने तय कर दी हो, उन्हीं में देखा जाता है. जब रं समाज ने देखा कि ऐसी शादी में पति तथा पत्नी के बीच अनबन हो रही है तो बाल विवाह पूरी तरह बंद कर दिया जाता है. अब जब भी तलाक हो तो अगर उनकी शादी रं समाज के रीति-रिवाजों के अनुसार हुई हो तो जो पक्ष पहले तलाक मांगता है उसे ‘कोल्ती चैमु’ करना पड़ता है इसके लिए पूरे गांव में एक सभा बुलाई जाती है उसमें दोनों पक्षों की बातें सुनी जाती है अगर दोनों पक्ष राजी हो तो पहले जमाने में एक सफेद कपड़े मात्र से ही कोलती चैमू हो जाता था, मगर आजकल शादी का खर्च, सफेद कपड़े आदि देकर अथवा परस्पर सहमति आधारित लेन-देन करके ‘कोलती चैम’ अर्थात् सम्बन्ध विच्छेद किया जाता है.
ब्रिटिश कालीन डिप्टी कमिश्नर चार्ल्स ए शेरिंग ने 1906 में लंदन से प्रकाशित किताब वेस्टर्न तिब्बत एंड ब्रिटिश बॉर्डर लैंड में रं घाटी और समाज पर विस्तृत लेख भी लिखा है। रं कल्याण संस्था की किताब अमटीकर में डॉ. अरुण कुकसाल ने लिखा है कि उच्च हिमालयी क्षेत्र में पल्लवित रं समाज का आधार, अतीत और आयाम घुमक्कड़ी रहा है। हिमालय के शिखरों की गोद में उनके घर, गांव हैं।
सहायक आयुक्त जीएसटी हल्द्वानी जीवन सिंह दुग्ताल हो या नैनीताल जिलाधिकारी धीराज सिंह गर्ब्याल, या जिला अस्पताल बीडी पांडे के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ दुग्ताल ये सभी रं समाज के प्रसिद्ध सामाजिक व्यक्ति है जो समाज को नई दिशा दे रहे है।