उत्तराखंड:जिस विरासत पर गर्व करते हैं,उसी की मर्यादा भुला रहे उत्तराखंड के अपने लोग?बद्रीनाथ धाम में शंख बजाना तक वर्जित है वहां देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल की आड़ में संस्कृति के नाम पर डीजे के शोर में ऐसा आयोजन?
उत्तराखंड/चमोली
बदरीनाथ धाम में शंख बजाना वर्जित है! जोर से तो क्या, धीरे भी नहीं बजाया जाता। धार्मिक परंपरा के अनुसार सदियों से बदरीनाथ धाम की आध्यात्मिक शांति और साधना की गरिमा को देखते हुए शंखनाद से परहेज किया जाता है। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस धाम में शंख की आवाज तक को लेकर ऐसी मान्यता है, उसी बदरीनाथ में ‘हमारी विरासत, हमारा भविष्य’ के नाम पर तेज संगीत, डीजे और नृत्य के बीच कॉन्सर्ट जैसा माहौल दिखाई दिया।

दरअसल बदरीनाथ धाम में आयोजित ‘देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल 2026’ अपने आयोजन के बाद विवादों में घिर गया है। 19 और 20 सितंबर को बदरीनाथ के अराइवल प्लाजा में हुए इस महोत्सव में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों, तेज ध्वनि और कार्यक्रम के स्वरूप को लेकर उत्तराखंड चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत के साथ ही ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य और संतों ने आपत्ति जताई है। पर्यावरणविदों ने भी हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए ऐसे आयोजनों में विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता बताई है।
भारतीय सेना और जिला प्रशासन चमोली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव की थीम ‘हमारी विरासत, हमारा भविष्य’ रखी गई थी। आयोजन का उद्देश्य उत्तराखंड की लोक संस्कृति, सीमा पर्यटन और स्थानीय आजीविका को बढ़ावा देना बताया गया। मंच पर प्रदेश की लोक संस्कृति से जुड़ी प्रस्तुतियां भी हुईं।
लेकिन आयोजन की तस्वीरों और वीडियो में नजर आए तेज संगीत, डीजे और नृत्य आधारित प्रस्तुतियों के बाद कार्यक्रम के स्वरूप को लेकर बहस शुरू हो गई। धार्मिक संगठनों और संतों की आपत्ति का केंद्र यही है कि बदरीनाथ महज पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख धाम है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान केवल घूमने-फिरने की जगह नहीं, बल्कि दर्शन, साधना और आध्यात्मिक शांति से जुड़ा तीर्थ है।
ऐसे में सवाल यह है कि जिस धाम की पहचान उसकी शांति और आध्यात्मिक वातावरण से है, वहां मनोरंजन के लिए कार्यक्रम की सीमा और स्वरूप तय करने में क्या धार्मिक मर्यादा को प्राथमिकता नहीं मिलनी चाहिए?

धार्मिक परंपराओं का हवाला
ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के प्रमुख शिष्य दंडी संन्यासी स्वामी प्रत्यक्षचैतन्यमुकुंदानंद गिरि महाराज ने भी आयोजन को लेकर आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने बदरिकाश्रम की धार्मिक परंपराओं और तपस्थली के रूप में इसकी मान्यता का उल्लेख करते हुए कहा कि यह क्षेत्र सदियों से ऋषि-मुनियों की साधना, तप और आध्यात्मिक अनुशासन से जुड़ा रहा है।
उनके अनुसार, बदरीनाथ क्षेत्र में शांति और संयम का विशेष महत्व है। शंखनाद को लेकर भी धार्मिक परंपरा में मान्यता है कि इससे तपस्या और साधना में व्यवधान पड़ सकता है। ऐसे में धाम के समीप बड़े साउंड सिस्टम और अत्यधिक ध्वनि वाले आयोजनों को लेकर गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है।
स्वामी प्रत्यक्षचैतन्यमुकुंदानंद गिरि ने यह भी कहा कि जब बदरीनाथ क्षेत्र की पारिस्थितिक संवेदनशीलता को देखते हुए ब्रह्मकमल जैसे हिमालयी पुष्पों और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया जाता है, तो बड़े साउंड सिस्टम और अन्य गतिविधियों से होने वाले शोर के प्रभाव को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
विडंबना यह भी है कि उत्तराखंड की अपनी लोक संस्कृति को मंच देने के लिए आयोजित कार्यक्रम में आधुनिक मनोरंजन का ऐसा स्वरूप दिखाई दिया, जिस पर अब उसी संस्कृति और धार्मिक परंपराओं से जुड़े लोग आपत्ति दर्ज करा रहे हैं।
उत्तराखंड की संस्कृति दिखानी है तो जरूर दिखाइए । जागर है, ढोल-दमाऊ है, हुड़का है, लोकगीत हैं, पांडव नृत्य है और सदियों पुरानी देव परंपराएं हैं। फिर बदरीनाथ जैसे धाम में संस्कृति के नाम पर कॉन्सर्ट जैसा माहौल बनाने की जरूरत क्यों पड़ी?
आखिर ‘हमारी विरासत, हमारा भविष्य’ की थीम वाले आयोजन में विरासत की धार्मिक मर्यादा ही सवालों के घेरे में आ जाए तो यह विरोधाभास नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है।