कहीं कुर्सी न हिला दे गदरपुर का गदर! धामी सरकार के लिए सिरदर्द बना नोटिस
उत्तराखंड में इन दिनों अलग-अलग मुद्दों को लेकर सियासत गरमाई हुई है। इस बीच काशीपुर के किसान सुखवंत सिंह आत्महत्या मामले में लगातार सवाल उठ रहे हैं। आलम ये है कि विपक्ष के साथ ही अब सत्ता पक्ष से जुड़े लोग भी सवाल उठाने लगे हैं। गौरतलब है कि एक किसान की सिस्टम से हारकर आत्महत्या और उसके बाद उठे सवालों ने ऐसा सियासी तूफान खड़ा कर दिया है, जिसने सरकार की नींद उड़ाई हुई है। उम्मीद थी कि सरकार पीड़ित परिवार की आवाज बनेगी, लेकिन पहले दिन से ही शासन-प्रशासन खाकी के मोह में उलझा नजर आया। इस बीच भाजपा विधायक अरविंद पांडे ने आत्महत्या प्रकरण में सीबीआई जांच की मांग उठाकर पूरे सिस्टम को आईना दिखा दिया।
अरविंद पांडे की इस मांग को लगभग हर राजनीतिक दल का समर्थन मिल रहा है। जनता ने भी विधायक की आवाज को जायज ठहराया है। लेकिन यह मांग सरकार को रास नहीं आई। मानो पूरा तंत्र ही अरविंद पांडे के खिलाफ खड़ा हो गया। बीते कुछ दिनों में उन पर आरोपों की झड़ी लगाई गई और अंततः प्रशासनिक अमले ने ऐसा कदम उठा दिया, जिसने उत्तराखंड की राजनीति में भूचाल ला दिया। विधायक के आवास पर नोटिस चस्पा कर उसे तोड़ने का फरमान जारी कर दिया गया। यह घटनाक्रम इसलिए भी अभूतपूर्व है, क्योंकि पहली बार ऐसा देखने को मिला कि भाजपा और संघ के भीतर से खुलकर आवाज उठी। लगभग आधी भाजपा और संघ अरविंद पांडे के समर्थन में खड़ी नजर आ रही है। संघ सूत्रों की मानें तो आरएसएस भी अपने एक सक्रिय कार्यकर्ता के साथ हुई इस कार्रवाई से बेहद नाराज है। पार्टी के कई नेता भले ही दायित्वों के चलते खुलकर सामने न आ रहे हों, लेकिन अंदरखाने पूरा समर्थन विधायक पांडे को बताया जा रहा है। खुले तौर पर समर्थन में उतरने वालों में पूर्व मुख्यमंत्री और हरिद्वार से सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत, सांसद अनिल बलूनी और पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक शामिल हैं। दरअसल, भाजपा के भीतर नाराजगी कोई नई बात नहीं है। लंबे समय से विधायकों और नेताओं में यह पीड़ा है कि मौजूदा सरकार की कुछ नीतियां जनता को साधने के बजाय जनता के लिए सिरदर्द बनती जा रही हैं। आरोप यह भी है कि धामी सरकार की किचन कैबिनेट में ऐसे लोगों और अधिकारियों का दखल बढ़ गया है, जिनका भाजपा संगठन की रीति-नीति और विचारधारा से कोई सीधा सरोकार नहीं है। गदरपुर प्रकरण ने न केवल भाजपा और संघ के भीतर असंतोष को हवा दी है, बल्कि जनता के बीच भी सरकार की छवि को गहरा नुकसान पहुंचाया है। क्योंकि यहां मामला सत्ता बनाम विधायक का नहीं, बल्कि एक किसान की मौत और न्याय की मांग का है। जब एक जनप्रतिनिधि सिस्टम से हारे किसान के लिए सीबीआई जांच की मांग करता है और बदले में उसी पर कार्रवाई होती है, तो सवाल उठना लाजमी है।