जंतर-मंतर पर प्रदर्शन! धरना देंगे तो डिटेन होंगे?शांतिपूर्ण प्रदर्शन मौलिक अधिकार,तो फिर हिरासत क्यों?जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर सुप्रीम कोर्ट के क्या थे आदेश?
नई दिल्ली।
देश की राजधानी में इस साल पहले मई में जंतर मंतर में प्रोटेस्ट देखने को मिला और फिर अक्टूबर की शुरुआत से ही विरोध प्रदर्शनों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज है। इस बार चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन करने पहुंचे विपक्षी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिए जाने से जंतर-मंतर एक बार फिर चर्चा में है।
2 अक्टूबर को करीब 1,000 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया, 7 अक्टूबर को INDIA गठबंधन के नेताओं के मार्च के दौरान भी पुलिस ने कार्रवाई की और 10 अक्टूबर को प्रस्तावित प्रदर्शन के लिए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) को अनुमति देने से इनकार कर दिया गया। 11 अक्टूबर को भी विरोध प्रदर्शनों और हिरासत की कार्रवाई का सिलसिला जारी रहा। लगातार हो रही इन कार्रवाइयों के बीच कानून को भी समझना होगा,क्योंकि जब भी सुप्रीम कोर्ट किसी मामले में कोई आदेश देता है तो वैसे ही अन्य मामलों में भविष्य में उक्त आदेश का हवाला दिया जाता है। इस प्रोटेस्ट की स्थिति भी इसी प्रकार है।
संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार निर्धारित कानूनों और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी उचित शर्तों के अधीन है। दूसरी ओर, पुलिस को भी प्रदर्शन रोकने या लोगों को हिरासत में लेने की शक्ति का इस्तेमाल कानूनी आधार पर करना होता है।

2018 में सुप्रीम कोर्ट ने तय की थी नियमन की रूपरेखा

दरअसल जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर महत्वपूर्ण फैसला 23 जुलाई 2018 को मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में आया था। सुप्रीम कोर्ट ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन को नागरिकों का मौलिक अधिकार माना, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि प्रदर्शन इस तरह आयोजित होने चाहिए कि आसपास के निवासियों, कार्यालयों और आम लोगों के जीवन में अनावश्यक बाधा न आए।

कोर्ट ने दिल्ली पुलिस आयुक्त को संबंधित एजेंसियों से परामर्श कर प्रदर्शन के नियमन के लिए उचित व्यवस्था और दिशानिर्देश तैयार करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने आवश्यक होने पर पूर्व अनुमति की व्यवस्था बनाने की भी बात कही थी। इस फैसले का अर्थ न तो हर जगह बिना अनुमति प्रदर्शन की खुली छूट है और न ही प्रशासन को शांतिपूर्ण विरोध पर मनमाने ढंग से रोक लगाने का अधिकार।

जंतर-मंतर पर 1,000 लोगों की सीमा, बड़े प्रदर्शनों के लिए अलग स्थल
दिल्ली पुलिस के दिशानिर्देशों के अनुसार, जंतर-मंतर पर एक समय में अधिकतम 1,000 लोगों के प्रदर्शन की व्यवस्था है। इसके लिए सामान्यतः प्रस्तावित कार्यक्रम से कम से कम 10 दिन पहले नई दिल्ली जिले के पुलिस उपायुक्त (DCP) के पास आवेदन करना होता है। हालांकि, दिशानिर्देशों में कम समय पहले दिए गए आवेदन पर भी परिस्थितियों और उपलब्ध स्थान के आधार पर विचार किए जाने का प्रावधान बताया गया है।वहीं एक हजार से अधिक और 50 हजार तक की भीड़ के लिए रामलीला मैदान निर्धारित है, जबकि इससे बड़ी सभाओं के लिए बुराड़ी का विकल्प रखा गया है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का निर्धारित समय सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक है। पुलिस यातायात, सुरक्षा, भीड़ की संख्या और सार्वजनिक व्यवस्था को ध्यान में रखकर अनुमति पर निर्णय ले सकती है।
इसका अर्थ है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन वहां पहुंचकर भीड़ जुटा लेना अपने आप में अनुमति का विकल्प नहीं बन जाता। इसी तरह, अनुमति देने से इनकार किए जाने पर भी आयोजकों के पास फैसले को चुनौती देने का कानूनी रास्ता रहता है।
किस कानून के तहत प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले सकती है पुलिस?
पुलिस की कार्रवाई को समझने के लिए हिरासत, गिरफ्तारी और निषेधाज्ञा के उल्लंघन के बीच अंतर करना जरूरी है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत सक्षम कार्यपालक मजिस्ट्रेट तत्काल रोकथाम या शीघ्र उपचार की जरूरत वाली परिस्थितियों में लिखित आदेश जारी कर सकता है। ऐसा आदेश किसी क्षेत्र में पांच या उससे अधिक लोगों के जमावड़े सहित कुछ गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा सकता है। आदेश का उल्लंघन करने पर,पुलिस को लॉ एंड ऑर्डर कंट्रोल करने से रोकने पर,पुलिस की कार्रवाई यानी सरकारी कार्य में बाधा डालने की परिस्थितियों के अनुसार कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 223 किसी लोक सेवक के विधिवत जारी आदेश की जानकारी होने के बावजूद उसका उल्लंघन करने से संबंधित है। इसके तहत कार्रवाई के लिए संबंधित कानूनी तत्वों का पूरा होना आवश्यक है।
पुलिस को संज्ञेय अपराध रोकने के लिए BNSS के तहत कुछ परिस्थितियों में निवारक कार्रवाई करने की शक्तियां भी प्राप्त हैं। लेकिन किसी व्यक्ति को केवल इसलिए हिरासत में लेना कि वह सरकार या किसी संवैधानिक संस्था के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना चाहता है, अपने आप में पर्याप्त कानूनी आधार नहीं है। पुलिस को लागू आदेश, संभावित अपराध या अन्य वैध आधार का सहारा लेना होगा।
जंतर मंतर में प्रदर्शनकारियों को आए दिन पुलिस द्वारा डिटेन किया जा रहा है, डिटेन और गिरफ्तारी एक ही बात नहीं हैं। डिटेन यानी हिरासत में लिए गए व्यक्ति को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया है या नहीं, यह कार्रवाई की प्रकृति और कानूनी आधार पर निर्भर करता है। यदि औपचारिक गिरफ्तारी होती है तो संविधान के अनुच्छेद 22 और लागू कानून के तहत गिरफ्तारी का कारण बताने, वकील से परामर्श लेने तथा निर्धारित समय में मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने जैसे अधिकार लागू होते हैं।
क्या पुलिस अनुमति न मिलने पर हर प्रदर्शन को रोक सकती है?
जंतर-मंतर पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत पूर्व अनुमति की व्यवस्था लागू है। अनुमति के बिना आयोजित कार्यक्रम को पुलिस रोक सकती है और वैधानिक परिस्थितियों में संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई भी कर सकती है। लेकिन अनुमति देने से इनकार करने का निर्णय भी उचित कारणों, लागू दिशानिर्देशों और संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप होना चाहिए।
यदि आयोजकों को लगता है कि अनुमति मनमाने ढंग से रोकी गई है या उनके शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर अनुचित प्रतिबंध लगाया गया है, तो वे पुलिस से पुनर्विचार का अनुरोध कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं। किसी निषेधाज्ञा से प्रभावित व्यक्ति BNSS में उपलब्ध प्रक्रिया के तहत संबंधित मजिस्ट्रेट से आदेश रद्द करने या उसमें बदलाव की मांग भी कर सकता है।
जंतर-मंतर के भविष्य पर भी सुप्रीम कोर्ट की नजर
जंतर-मंतर को लेकर बहस अब केवल भीड़ की संख्या और पुलिस अनुमति तक सीमित नहीं है। 10 अक्टूबर को सामने आए घटनाक्रम के बाद सुप्रीम कोर्ट ने शांतिपूर्ण और वैध प्रदर्शन करने वालों के लिए बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने तथा उपयुक्त वैकल्पिक स्थलों की पहचान करने की जरूरत पर भी टिप्पणी की। इससे स्पष्ट है कि प्रदर्शन को नियंत्रित करने के साथ-साथ उसके लिए व्यावहारिक और सुरक्षित व्यवस्था उपलब्ध कराने का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है।
गौरतलब है कि जंतर-मंतर दशकों से जन आंदोलनों, कर्मचारी संगठनों, किसान समूहों और राजनीतिक दलों के विरोध का प्रमुख केंद्र रहा है। ऐसे में कानूनी व्यवस्था का उद्देश्य केवल भीड़ को हटाना नहीं, बल्कि प्रदर्शनकारियों के संवैधानिक अधिकार, आम नागरिकों की सुविधा और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन कायम करना है।ऐसे में प्रदर्शनकारियों को भी संविधान के अनुसार ही प्रदर्शन करना चाहिए।