Sep 05, 2026 Login

चांद पर पहुंच गए, लेकिन...! जाति व्यवस्था पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने जताई चिंता, जानें क्या है पूरा मामला?

We reached the Moon, but...! Bombay High Court expresses concern over the caste system; find out the full story.

नई दिल्ली। हाथ से मैला ढोने की अमानवीय प्रथा को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि भारत भले ही चांद तक पहुंच चुका हो, लेकिन समाज में जाति व्यवस्था से जुड़ी बुराइयां आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। यही सामाजिक असमानता कई लोगों को ऐसे काम करने के लिए मजबूर करती है, जो उनकी मानवीय गरिमा और सम्मान के खिलाफ हैं। इसी मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की उस नीति को रद्द कर दिया, जिसमें खतरनाक सफाई के दौरान जान गंवाने वाले श्रमिकों के परिवारों को मुआवजा देने की जिम्मेदारी निजी सोसाइटियों और नियोक्ताओं पर डाल दी गई थी। अदालत ने साफ किया कि ऐसे मामलों में सरकार अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकती और पीड़ित परिवारों के अधिकारों की रक्षा करना जरूरी है। जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की पीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह पीड़ितों के आश्रितों को फौरन मुआवजा दे और बाद में चाहे तो संबंधित निजी संस्थाओं या नियोक्ताओं से वह राशि वसूल कर ले। अदालत ने सरकार को आदेश दिया कि वह छह महीने के भीतर उन सभी व्यक्तियों की पहचान करे, जिनकी मृत्यु मैनुअल स्कैवेंजर्स अधिनियम 2013 के दायरे में आने वाली खतरनाक सफाई के दौरान हुई हो। पहचान किए जाने के बाद राज्य सरकार की ओर से ऐसे प्रत्येक मृतक व्यक्ति के आश्रितों को 30 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाएगा। पीठ ने कहा कि 21वीं सदी में अंतरिक्ष के क्षेत्र में उपलब्धियों का दावा करने के बावजूद यह कड़वी सच्चाई सामने आती है कि देश में जातिगत भेदभाव व सामाजिक कुप्रथाएं कायम हैं। अदालत ने कहा कि 2013 का अधिनियम सार्वजनिक या निजी नियोक्ता के आधार पर श्रमिकों के बीच कोई भेदभाव नहीं करता है। इस नीति को समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन मानते हुए अदालत ने सरकारी प्रस्ताव के उस प्रावधान को खारिज कर दिया, जिसके जरिये निजी व्यक्तियों को मुआवजे के भुगतान के लिए उत्तरदायी बनाया गया था।