अल्पसंख्यक संस्थानों की मान्यता के लिए नई नियमावली जारी: 85% अल्पसंख्यक छात्रों की शर्त से बढ़ेगी अन्य संस्थानों की मुश्किलें
देहरादून। उत्तराखंड सरकार ने अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों की मान्यता और उसके नवीनीकरण को लेकर एक नई और सख्त नियमावली जारी की है। इस नई व्यवस्था के तहत मान्यता के नवीनीकरण के लिए एक ऐसी महत्वपूर्ण शर्त रखी गई है, जिसने राज्य के कई शिक्षण संस्थानों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। नियम के मुताबिक, मान्यता बरकरार रखने के लिए संस्थानों को यह स्व-घोषणा करनी होगी कि उनके यहाँ पिछले तीन शैक्षणिक वर्षों में गैर-अल्पसंख्यक समुदाय के 15 फीसदी से अधिक छात्र नामांकित नहीं थे। यानी संस्थान में कम से कम 85 प्रतिशत छात्र अल्पसंख्यक समुदाय के होने अनिवार्य हैं।
इस कड़ी शर्त के लागू होने से मदरसों को छोड़कर अन्य अल्पसंख्यक संस्थानों (सिख, ईसाई, बौद्ध, पारसी और जैन) के अस्तित्व और उनकी मान्यता पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं, क्योंकि सामान्यतः इन संस्थानों में 85 फीसदी अल्पसंख्यक छात्र नहीं होते हैं। इस बड़े प्रशासनिक फेरबदल के तहत प्रदेश सरकार आगामी 1 जुलाई 2026 से मौजूदा मदरसा बोर्ड को पूरी तरह समाप्त करने जा रही है। इसके स्थान पर 'उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण' का गठन किया गया है। अब यही नया प्राधिकरण मदरसों सहित राज्य के सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों की मान्यता और नियमों की निगरानी करेगा। मान्यता के इच्छुक सभी संस्थानों को प्राधिकरण के आधिकारिक वेब पोर्टल पर जाकर ऑनलाइन आवेदन करना होगा और तय शुल्क भी डिजिटल माध्यम से जमा करना अनिवार्य होगा। विशेषज्ञों और जानकारों का मानना है कि नियमावली की इस 85% वाली शर्त के दायरे में केवल मदरसे ही आसानी से फिट बैठेंगे, क्योंकि वहाँ अमूमन शत-प्रतिशत छात्र एक ही समुदाय से होते हैं। इसके विपरीत, ईसाई मिशनरी स्कूलों, सिख या जैन समाज द्वारा संचालित प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में बहुसंख्यक और अन्य समुदायों के बच्चों की संख्या काफी अधिक होती है। ऐसे में इस नई नियमावली के लागू होने के बाद, मदरसों के इतर अन्य अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थानों के सामने अपनी अल्पसंख्यक मान्यता को बचाए रखने का एक बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।