Oct 25, 2026 Login
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आधुनिक तकनीक या आत्ममुग्धता का नया अवतार! जब 33 साल पहले ब्रह्मलीन संत से AI के जरिये प्रधानमंत्री मोदी को दिलवाया गया आशीर्वाद

Modern technology or a new manifestation of narcissism! When Prime Minister Modi received a blessing—via AI—from a saint who had attained *brahmaleen* (passed away) 33 years earlier.

नई दिल्ली। नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित 'चिन्मय अमृत महोत्सव' के मंच पर हाल ही में विज्ञान, अध्यात्म और समकालीन राजनीति का एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने देश में तकनीक के प्राथमिक उपयोग पर नई बहस छेड़ दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 33 वर्ष पूर्व 1993 में ब्रह्मलीन हो चुके प्रख्यात आध्यात्मिक गुरु स्वामी चिन्मयानंद के होलोग्राफिक अवतार यानी 'होलोबॉट' से संवाद किया। पर्दे पर त्रि-आयामी (3D) तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के तालमेल से एक आभासी संत प्रकट हुए और फिर जो कुछ हुआ, उसने तकनीक प्रेमियों को हैरान और आलोचकों को चुटकियां लेने का भरपूर मौका दे दिया। सभागार में तकनीक का चमत्कार तब चर्चा से ज्यादा विवाद का विषय बन गया, जब होलोग्राफिक अवतार ने ठीक वही बातें कहीं जो मौजूदा राजनीतिक विमर्श के अनुकूल बैठती हैं। अवतार ने 1993 की वडोदरा की मुलाकात याद दिलाते हुए कहा, 'आज भारत को देखो, मुझे बहुत खुशी है कि 1993 में जिस व्यक्ति से मेरी मुलाकात हुई थी, आज वही भारत का प्रधानमंत्री है।' बात यहीं खत्म नहीं हुई, आभासी स्वामी जी ने प्रधानमंत्री को शिखर पर अकेलेपन का अहसास कराते हुए श्रीखंड खाने की सलाह तक दे डाली।

प्रधानमंत्री ने इसे एक अत्यंत भावुक और अलौकिक आध्यात्मिक अनुभव बताया। लेकिन सवाल यह उठा कि जो शब्द एक दिवंगत विभूति ने अपने जीवनकाल में कभी नहीं कहे, उन्हें कंप्यूटर एल्गोरिदम और पूर्व-लिखित स्क्रिप्ट के जरिए उनके मुंह में डालकर क्या साबित करने की कोशिश की जा रही है? क्या आधुनिक तकनीक का शिखर अब सत्ता के लिए अलौकिक वैधता और राजनीतिक विज्ञापन गढ़ने का साधन बन चुका है? इस पूरे घटनाक्रम पर सोशल मीडिया से लेकर बौद्धिक गलियारों तक तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर ध्रुव राठी सहित कई लोगों ने इस पर तीखा तंज कसते हुए वैश्विक संदर्भों से इसकी तुलना की। राठी ने कटाक्ष करते हुए कहा कि आज अमेरिका जैसी महाशक्ति AI का इस्तेमाल उन जटिल गणितीय और वैज्ञानिक पहेलियों को हल करने में कर रही है जिन्हें इंसान आज तक नहीं सुलझा सका। चीन इसका उपयोग अस्पतालों में शुरुआती चरण में कैंसर का पता लगाने और स्वास्थ्य क्रांति लाने के लिए कर रहा है। वहीं भारत में सत्ता के मंचों पर करोड़ों की लागत वाली इस आधुनिक तकनीक का उपयोग एक दिवंगत संत का आभासी पुतला बनाकर खुद की पीठ थपथपाने और जनमानस के सामने अपनी तारीफ करवाने के लिए किया जा रहा है। यह तंज केवल एक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस कड़वी हकीकत की ओर इशारा करता है जहां जनता महंगाई, बेरोजगारी, गिरते स्वास्थ्य ढांचे और बदहाल शिक्षा व्यवस्था से जूझ रही है, और सत्ता पक्ष 21वीं सदी के सबसे क्रांतिकारी वैज्ञानिक उपकरण को केवल 'पीआर और परसेप्शन' के तराजू में तौल रहा है।

होलोग्राम और जेनरेटिव एआई की ताकत निर्विवाद है। इसका उपयोग शिक्षा के लोकतंत्रीकरण, शोध और ऐतिहासिक दस्तावेजों के सटीक संरक्षण में होना चाहिए था। लेकिन जब तकनीक का इस्तेमाल अतीत के महापुरुषों को 'डिजिटल कठपुतली' बनाकर वर्तमान के राजनीतिक आख्यान को चमकाने के लिए किया जाने लगे, तो यह न केवल वैज्ञानिक चेतना बल्कि उस संत की गरिमा के साथ भी खिलवाड़ बन जाता है। सवाल यह है कि क्या भारत का वैज्ञानिक विमर्श अब केवल इस बात पर गर्व करेगा कि हमने कंप्यूटर से एक ऐसा रोबोट तैयार कर लिया जो देश के प्रधानमंत्री की शान में कसीदे पढ़ सकता है? अध्यात्म आत्म-साक्षात्कार सिखाता है और तकनीक तार्किकता। लेकिन जब अध्यात्म का चोला ओढ़ाकर तकनीक को आत्म-मुग्धता और राजनीतिक ब्रांडिंग का औजार बना दिया जाए, तो यह आधुनिकता नहीं, बल्कि जनसंपर्क का ऐसा अतिरेक है जो जनता के विवेक पर भी सवाल खड़े करता है।