Aug 19, 2026 Login

सफ़ल राजनीति का अधूरा नेता! न मुख्यमंत्री का कार्यकाल रहा पूरा,न ही राज्यपाल का कार्यकाल!भगत सिंह कोश्यारी जो घिरे रहे हमेशा विवादों में,अब लगा रहे हैं राजनीतिक जीवन पर फुल स्टॉप?

Incomplete leader of successful politics! Neither the term of the Chief Minister was complete, nor the term of the Governor! Bhagat Singh Koshyari who was always surrounded in controversies

महाराष्ट्र के 22वें राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के इस्तीफा देने के बाद से ही एक खबर सुर्खियों में कि अब उनके राजनीतिक करियर पर भी विराम लगने जा रहा है। उनके एक ट्वीट ने उनके राजनीतिक जीवन से मुक्त होने की बात उजागर की है। उन्होंने ट्वीट में लिखा है कि"पीएम मोदी की हाल ही की मुंबई यात्रा के दौरान मैने उन्हें अपनी सभी राजनीतिक ज़िम्मेदारियों से मुक्त होने और अपना शेष जीवन पढ़ने,लिखने,और अन्य गतिविधियों में बिताने की अपनी इच्छा से अवगत कराया है। मुझे हमेशा पीएम मोदी से स्नेह मिला है और मुझे इस सम्बंध में भी ऐसा ही मिलने की उम्मीद है।" 

भगत सिंह कोश्यारी के इस ट्वीट के बाद उनके राजनीतिक सफर पर अब स्टॉप लगने वाला है ऐसा अंदाजा लगाया जा रहा है। यानी इसे कोश्यारी का राजनीति से संन्यास भी मान सकते हैं।


महाराष्ट्र की कुर्सी पर भगत सिंह कोश्यारी ने अधूरे 3 सालो में विवादों की झड़ी लगा दी।राज्यपाल के कार्यकाल में जहाँ महाविकास अघाड़ी के साथ उनकी तनातनी खुलकर सामने आई, तो वही उन्होंने मराठा साम्राज्य के संस्थापक शिवाजी महाराज को पुराने समय का प्रतीक कहकर महाराष्ट्र की शिवाजी भूमि पर अपने ही खिलाफ लोगो को खड़ा कर दिया। शिवाजी को जिस जगह भगवान की तरह पूजा जाता है वहाँ राज्यपाल जब उनके भगवान को लेकर विवादित टिप्पणी करने लगे तो भला वहां की जनता उन्हें कैसे राज्यपाल माने? इसीलिए भगत सिंह कोश्यारी की विवादित बयान को लेकर खूब आलोचना हुई, हालांकि बाद में विवाद बढ़ता देख उन्होंने सफाई भी दी, लेकिन तीर कमान से निकल जाने पर भला कब वापस आया है?


3 साल के राज्यपाल कार्यकाल में भगत सिंह कोश्यारी ने महाराष्ट्र की जनता का दिल तोड़ने का कोई मौका नही छोड़ा था। अगर आपको याद हो तो 29 जुलाई 2022 में उन्होंने मुंबई में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मुंबई के विकास में गुजराती राजस्थानी लोगो का योगदान बता दिया था। लो जी महाराष्ट्र में वहाँ के लोगो की प्रशंसा करने की बजाय दूसरे राज्यो के लोगो से महाराष्ट्र का विकास बताना फिर महाराष्ट्र की जनता को नाराज करने जैसा हो गया।


पिछले ही साल मार्च में भी भगत सिंह कोश्यारी ने ज्योतिराव फुले और सावित्री बाई फुले के बाल विवाह पर विवादित टिप्पणी की थी। दोनों के विवाह को लेकर उन्होंने कहा था कि दस साल की उम्र सावित्री बाई फुले और 13 साल की उम्र के उनके पति थे,जब उनका विवाह हुआ,अब सोचे कि इतनी उम्र में शादी करने के बाद लड़का और लड़की क्या सोच रहे होंगे। उनके इस विवादित बयान के बाद उन्हें काफी आलोचना का सामना करना पड़ा था। 


शायद यही कुछ वजह रही हो कि राज्यपाल का कार्यकाल पूरा किये बिना ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। ऐसा नही है कि भगत सिंह कोश्यारी का महाराष्ट्र में राज्यपाल का ही सफर अधूरा रहा हो,उत्तराखंड में भी मुख्यमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल अधूरा रहा था। 2001-2002 तक भगत सिंह कोश्यारी उत्तराखंड के दूसरे मुख्यमंत्री के तौर पर कुर्सी में विराजमान रहे,मुख्यमंत्री का कार्यकाल भी सत्ता परिवर्तन के कारणों से वो पूरा नही कर पाए थे।


आइये अब एक नजर डालते है भगत सिंह कोश्यारी के राजनीतिक सफर पर

कोश्यारी के राजनीतिक सफर में नजर डाले तो पाएंगे कि वो बड़े पदों पर ज्यादा वक्त तक नहीं टिक पाए। उनका सफल राजनीतिक जीवन भले ही रहा हो लेकिन अधूरा साबित रहा। 17 जून 1942 में उत्तराखंड में जन्मे भगत सिंह कोश्यारी ने अल्मोड़ा यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई पूरी की, कोश्यारी छात्र राजनीति में काफी सक्रिय थे, जिसके बाद वो आरएसएस से भी जुड़ गए। बतौर आरएसएस नेता उन्होंने इमरजेंसी के खिलाफ आंदोलनों में हिस्सा लिया और जेल भी गए। 


भगत सिंह कोश्यारी का राजनीतिक सफर 1997 में शुरू हुआ, जब वो विधायक चुने गए थे,तब उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा हुआ करता था। साल 2000 में उत्तराखंड बनने के बाद वो ऊर्जा मंत्री रहे, इसके बाद 2001 में उन्हें उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बना दिया गया, एक साल बाद चुनाव हुए और बीजेपी सत्ता से बाहर हो गई यानी करीब एक साल तक कोश्यारी सीएम पद पर रहे।

साल 2007 में फिर विधानसभा चुनाव हुए और उत्तराखंड में बीजेपी ने एक बार फिर सरकार बनाई, इस बार कोश्यारी फिर से सीएम पद पर बैठने का इंतजार कर रहे थे, लेकिन बीजेपी ने उनकी जगह भुवन चंद खंडूरी को सीएम बना दिया गया,यानी पार्टी ने उन पर विश्वास नही दिखाया।

इसके बाद 2008 में कोश्यारी को उत्तराखंड से राज्यसभा भेज दिया गया। इसके अलावा कोश्यारी उत्तराखंड बीजेपी के भी अध्यक्ष रहे। उत्तराखंड की राजनीति में भगत सिंह कोश्यारी लगातार हाशिए पर ही रहे, क्योंकि वो आरएसएस के पुराने नेता थे, इसीलिए बीजेपी ने उत्तराखंड का सीएम तो नही बनाया लेकिन 2019 में उन्हें राज्यपाल का पद सौंप दिया। अपने बड़बोलेपन की वजह से वो महाराष्ट्र में अपना वर्चस्व स्थापित नही कर पाए। राज्यपाल के पद पर रहते हुए भी वो महाराष्ट्र में ज़्यादातर लोगो की आंखों की किरकिरी ही बने रहे,इसके बारे में थोड़ा तो हम पहले ही बता चुके है,थोड़ा आगे और जानिए।

दरअसल राज्यपाल का पद संभालने के कुछ ही हफ्ते बाद कोश्यारी के नाम बड़ा विवाद जुड़ गया। महाराष्ट्र में चुनाव होने के बाद जब किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो सरकार बनाने की कवायद शुरू हुई। बातचीत शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के बीच हो रही थी और माना जा रहा था कि यही गठबंधन सरकार बनाने जा रहा है, तभी कुछ ऐसा हुआ जिसने पूरे देश को चौंकाकर रख दिया। 23 नवंबर 2019 की सुबह अचानक महाराष्ट्र राजभवन से तस्वीरें सामने आईं, जिनमें देखा गया कि देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार शपथ ले रहे हैं। फडणवीस ने बतौर मुख्यमंत्री और पवार ने उप मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की मौजूदगी में ही ये सब हुआ, हालांकि इसके बाद शरद पवार ने पूरा मामला संभाला और अजित पवार ने बीजेपी का साथ छोड़ दिया। बाद में एमवीए गठबंधन ने ही राज्य में सरकार बनाई गयी। इस पूरे ऑपरेशन को लेकर राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की राजनीतिक गलियारों में खूब आलोचना हुई।

इसके बाद भी उनके विवादों से रिश्ते खत्म नही हुए। एमवीए सरकार और कोश्यारी के बीच का मनमुटाव तब सामने आया था, जब आरोप लगाया गया कि राज्य सरकार ने राज्यपाल को मुंबई से उत्तराखंड जाने के लिए सरकारी विमान देने से इनकार कर दिया। सीएम ऑफिस की तरफ से कहा गया कि इसके लिए इजाजत लेनी चाहिए थी, इस पर बीजेपी और एमवीए सरकार के बीच जमकर हंगामा हुआ था। 

राज्यपाल के तौर पर भगत सिंह कोश्यारी के बयान भी खूब चर्चा में रहे और उन्हें लेकर विवाद भी हुआ।  ये भी हम पहले बता चुके है ,दरअसल जुलाई 2022 में एक कार्यक्रम के दौरान भगत सिंह कोश्यारी ने कुछ ऐसा कह दिया, जिससे मराठी लोगों की भावनाएं आहत हो गईं और विपक्ष ने उन्हें जमकर घेरा। कोश्यारी ने कहा था कि अगर राजस्थानी और गुजराती समुदाय के लोगों को मुंबई से निकाल दिया जाए तो ये देश की आर्थिक राजधानी नहीं रहेगी इस बयान से खुद बीजेपी ने भी किनारा कर लिया था। यानी बीजेपी भी जानती थी कि भगत जो कह चुके है उसका डैमेज कंट्रोल मुश्किल होगा।


इसके बाद उनका छत्रपति शिवाजी को लेकर दिया गया बयान भी खूब चर्चा में रहा,जिसके बारे में पहले भी बताया गया।इस बयान के बाद विपक्षी दलों ने कोश्यारी का इस्तीफा मांगा था। इस बयान को लेकर जारी विवाद के बीच ही कोश्यारी ने राजनीति संन्यास लेने की इच्छा जताई और आखिरकार उन्होंने इस्तीफा भी दे ही दिया।

80 साल के भगत सिंह कोश्यारी आरएसएस के पुराने स्वयंसेवक रहे है। उनके बड़बोलेपन की वजह से केंद्र सरकार को महाराष्ट्र के राज्यपाल पद से हटाना मजबूरी रही या कुछ और बहरहाल सूत्रों की माने तो भगत सिंह कोश्यारी के ट्वीट के बाद पीएम मोदी ने भी उनसे इशारों में इस्तीफा देने को कहा था। इस्तीफे के बाद विपक्ष के एक फ्रंट पर बैरिकेड भले ही लग गया हो लेकिन हैरानी अब भी बनी हुई है कि आखिर भगत सिंह कोश्यारी को राज्यपाल पद से हटाने के लिए विपक्षी दलों ने धरना,विरोध प्रदर्शन, तमाम रैलियां तक कर डाली,इतना ही नही महाराष्ट्र की गठबंधन सरकार में भी बीजेपी शिवसेना में कई बार राज्यपाल को लेकर फूट नजर आयी