पता नहीं खुद को जी7 क्यों कहते हैं? पुतिन ने पश्चिमी देशों पर कसा तंज, आंकड़ों के जरिए दिखाई बीआरआईसी की असली ताकत
नई दिल्ली। वैश्विक अर्थव्यवस्था में आ रहे बड़े संरचनात्मक बदलावों के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पश्चिमी देशों के आर्थिक दबदबे को खुली चुनौती दी है। नई दिल्ली में आयोजित 'ब्रिक्स बिजनेस फोरम' को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति पुतिन ने जी-7 समूह पर तीखा प्रहार किया और ब्रिक्स को वैश्विक अर्थव्यवस्था का नया और शक्तिशाली इंजन करार दिया। पुतिन ने दो टूक शब्दों में कहा कि पश्चिमी देश निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा से डरते हैं और इसी वजह से रूस पर मनमाने प्रतिबंध थोपे गए हैं। हालांकि, तमाम प्रतिबंधों के बावजूद ब्रिक्स देश आपसी सहयोग के दम पर वैश्विक चुनौतियों का डटकर मुकाबला कर रहे हैं।
वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में बदलते शक्ति संतुलन के बीच नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स बिजनेस फोरम से रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पश्चिमी देशों और जी-7 की आर्थिक भूमिका पर तीखा सवाल खड़ा किया। पुतिन ने कहा कि दुनिया इस समय व्यापक और संरचनात्मक बदलावों के दौर से गुजर रही है और ऐसे समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था की वास्तविक तस्वीर पुराने शक्ति केंद्रों के बजाय उभरती अर्थव्यवस्थाओं की बढ़ती भूमिका से समझी जानी चाहिए। पुतिन ने अपने संबोधन में पश्चिमी देशों पर निष्पक्ष आर्थिक प्रतिस्पर्धा से बचने का आरोप लगाते हुए रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों की आलोचना की। उनका दावा था कि प्रतिबंधों के बावजूद रूस आगे बढ़ रहा है और ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। उन्होंने इसे बदलती विश्व अर्थव्यवस्था का संकेत बताते हुए कहा कि आपसी व्यापार, निवेश और भरोसेमंद कारोबारी रिश्ते वैश्विक आर्थिक चुनौतियों से निपटने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। पुतिन ने ब्रिक्स की आर्थिक ताकत को आंकड़ों के जरिए समझाने की कोशिश की। उनके अनुसार पिछले पांच वर्षों में दुनिया की कुल जीडीपी का 40 प्रतिशत से अधिक उत्पादन ब्रिक्स देशों ने किया है, जबकि जी-7 देशों की हिस्सेदारी करीब 29 प्रतिशत रह गई है। इसी आधार पर उन्होंने सवालिया अंदाज में कहा कि जब आर्थिक योगदान की तस्वीर ऐसी है तो जी-7 को खुद को ‘ग्रेट-7’ कहने की जरूरत क्यों महसूस होती है। पुतिन के मुताबिक समान अवधि में वैश्विक आर्थिक विकास की 50 प्रतिशत से अधिक वृद्धि ब्रिक्स देशों की वजह से हुई, जबकि जी-7 का योगदान लगभग 18 प्रतिशत रहा। हालांकि इन आंकड़ों को पुतिन के प्रस्तुत किए गए आकलन के रूप में देखना जरूरी है। जीडीपी की गणना के अलग-अलग तरीके—जैसे बाजार विनिमय दर और क्रय शक्ति समानता से देशों और समूहों की हिस्सेदारी के आंकड़े बदल सकते हैं। फिर भी उनका संदेश साफ था कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में उभरती शक्तियों का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। पुतिन ने भारत की तकनीकी प्रगति की भी खुलकर सराहना की। उन्होंने कहा कि भारतीय आईटी कंपनियां तेज गति से आगे बढ़ रही हैं। यह टिप्पणी ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब भारत अपनी डिजिटल अर्थव्यवस्था, तकनीकी सेवाओं और स्टार्टअप क्षमता को वैश्विक बाजार में लगातार विस्तार दे रहा है। पुतिन के अनुसार ब्रिक्स देशों के बीच दुनिया के करीब 40 प्रतिशत व्यापार का संचालन होता है। उन्होंने भरोसेमंद बिजनेस-टू-बिजनेस संबंधों और मजबूत आर्थिक साझेदारियों को अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की रीढ़ बताया। भारत के संदर्भ में यह संदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नई दिल्ली ब्रिक्स को केवल राजनीतिक मंच के रूप में नहीं, बल्कि व्यापार, निवेश, तकनीक और विकास के सहयोग के मंच के रूप में मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। रूसी राष्ट्रपति ने पर्यटन, उद्योग और व्यापार के क्षेत्रों में रूस को साझेदार देशों के लिए खुला बताते हुए वैश्विक ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा मजबूत करने में सहयोग की पेशकश की। उन्होंने भरोसेमंद लॉजिस्टिक और परिवहन नेटवर्क विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। पुतिन ने आर्कटिक ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर और नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर जैसे रणनीतिक मार्गों के विकास में रूस की भूमिका का उल्लेख किया। ऐसे गलियारे भविष्य में एशिया, यूरोप और अन्य बाजारों के बीच व्यापारिक संपर्क को नया स्वरूप दे सकते हैं। रूस-यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया के संकट के बीच पुतिन ने पश्चिमी प्रतिबंधों को आर्थिक प्रतिस्पर्धा का ‘बदसूरत रूप’ बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रतिस्पर्धा को दबाने के लिए अब केवल कारोबारी नहीं, बल्कि सरकारी स्तर पर भी प्रतिबंधात्मक उपाय अपनाए जा रहे हैं। नई दिल्ली के मंच से आया यह संदेश वैश्विक राजनीति से कहीं आगे आर्थिक शक्ति के बदलते समीकरणों की ओर इशारा करता है। ब्रिक्स की बढ़ती आर्थिक हिस्सेदारी और भारत जैसी तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भूमिका ने वैश्विक व्यवस्था में नए केंद्र तैयार किए हैं। लेकिन असली परीक्षा यह होगी कि ब्रिक्स अपनी विशाल आबादी और आर्थिक क्षमता को ठोस व्यापार, निवेश, तकनीकी सहयोग और साझा संस्थागत ढांचे में कितना बदल पाता है। पुतिन का जी-7 पर तंज दरअसल इसी बड़ी बहस का हिस्सा है—क्या आने वाली दुनिया कुछ पारंपरिक पश्चिमी शक्तियों के इर्द-गिर्द घूमेगी या वैश्विक दक्षिण की आवाज और आर्थिक ताकत मिलकर नया संतुलन बनाएगी? नई दिल्ली से उठी ब्रिक्स की आवाज इस बदलाव की दिशा का संकेत जरूर देती है।