राहुल गांधी के बयानों पर पूर्व सैन्य अधिकारियों का फूटा गुस्सा: कहा-राष्ट्रीय सुरक्षा और एजेंसियों का मनोबल तोड़ना देश के लिए खतरनाक
देहरादून। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजित डोभाल और देश की सुरक्षा एजेंसियों को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा दिए गए बयानों पर पूर्व सैन्य अधिकारियों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। पूर्व सैनिकों ने इन बयानों को देश की सुरक्षा व्यवस्था और सेना के मनोबल को कमजोर करने वाला करार दिया है। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में पूर्व सैन्य अधिकारियों ने खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए राहुल गांधी के तौर-तरीकों पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी की टिप्पणियों ने नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। राहुल गांधी के बयानों पर पूर्व सैन्य अधिकारियों ने नाराजगी जताते हुए कहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी संस्थाओं और अधिकारियों पर राजनीतिक हमले करते समय जिम्मेदारी और तथ्यों का ध्यान रखा जाना चाहिए। पूर्व मेजर जनरल सम्मी सबरवाल ने चेतावनी दी कि राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन सेना और सुरक्षा एजेंसियों का मनोबल कमजोर करने वाली बयानबाजी देश के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है। वहीं, पूर्व कमांडो शमशेर सिंह बिष्ट ने सर्जिकल स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर जैसी सैन्य कार्रवाइयों पर सवाल उठाने के तरीके को लेकर अपनी आपत्ति जताई। पूर्व मेजर जनरल सम्मी सबरवाल ने कहा कि राजनीति में विरोधियों की आलोचना करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील पदों पर बैठे अधिकारियों को निशाना बनाते समय उनकी जिम्मेदारियों और पद की मर्यादा को भी समझना चाहिए। उनके मुताबिक, संवैधानिक व्यवस्था से जुड़े कुछ पदों पर बैठे लोग हर राजनीतिक आरोप का सार्वजनिक रूप से जवाब नहीं दे सकते। सबरवाल ने कहा कि किसी अधिकारी के कामकाज पर सवाल उठाना और ऐसे आरोप लगाना, जिनसे जनता के बीच संस्थाओं को लेकर संदेह पैदा हो, दोनों अलग-अलग बातें हैं। उन्होंने चिंता जताई कि यदि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी एजेंसियों के प्रति लोगों का भरोसा कमजोर होता है, तो इसका असर देश की सुरक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में आरोप लगाने वालों को अपने दावों के समर्थन में तथ्य प्रस्तुत करने चाहिए। उनके अनुसार, आरोप लगाने के बाद जवाबदेही से बचना उचित नहीं है। सबरवाल ने राहुल गांधी की ओर से पहले पेगासस मामले में उठाए गए सवालों का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि गंभीर आरोप लगाने के बाद उन्हें प्रमाणित करने की जिम्मेदारी भी होनी चाहिए। उन्होंने इसे ‘शूट एंड स्कूट’ की रणनीति बताते हुए कहा कि पहले आरोप लगाना और फिर जवाबदेही से पीछे हटना सही तरीका नहीं है। उन्होंने वेनेजुएला का उदाहरण देते हुए यह आशंका भी जताई कि संस्थाओं और चुनावी प्रक्रियाओं पर लगातार सवाल उठाकर राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बनाया जा सकता है। उन्होंने इस संदर्भ में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए से जुड़ी कथित रणनीतियों का उल्लेख किया और भारत में भी ऐसी कोशिशों की आशंका जताई। हालांकि, भारत में इस तरह की किसी साजिश के दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इसे उनका आरोप और आशंका ही माना जाना चाहिए। पूर्व सैन्य अधिकारी और थर्ड पैराशूट रेजिमेंट के पूर्व कमांडो शमशेर सिंह बिष्ट ने भी सैन्य अभियानों को लेकर होने वाली राजनीतिक बहस पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि सेना का प्राथमिक दायित्व देश की रक्षा करना और दुश्मन के हमलों का जवाब देना है। सीमा पर तैनात जवानों से हर कार्रवाई के दौरान सबूत जुटाने की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है। बिष्ट के मुताबिक, सैन्य अभियानों की परिस्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण होती हैं। ऐसे में दिल्ली में बैठकर सवाल उठाना आसान हो सकता है, लेकिन सीमा पर वास्तविक हालात का सामना करना बिल्कुल अलग बात है। उन्होंने कहा कि सैन्य कार्रवाई पर चर्चा करते समय जवानों की जिम्मेदारियों और उन परिस्थितियों को भी समझना चाहिए, जिनमें वे काम करते हैं। हालांकि, सैन्य अभियानों पर सवाल उठाने और सरकार से जानकारी मांगने का मुद्दा राष्ट्रीय सुरक्षा, पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही के बीच संतुलन से भी जुड़ा है। ऐसे मामलों में उपलब्ध तथ्यों और आधिकारिक जानकारी के आधार पर चर्चा महत्वपूर्ण मानी जाती है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल से संबंध होने के कारण यह विवाद प्रदेश में भी चर्चा का विषय बन गया है। भाजपा नेता और कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी ने राहुल गांधी की टिप्पणियों की आलोचना करते हुए इसे उत्तराखंड के स्वाभिमान से जोड़कर देखा। उन्होंने प्रदेश कांग्रेस के नेताओं से भी इस मामले पर अपना पक्ष स्पष्ट करने की मांग की। इस घटनाक्रम ने राज्य में भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बयानबाजी को और तेज कर दिया है। भाजपा की ओर से जहां राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अधिकारियों के सम्मान और संस्थाओं के मनोबल का मुद्दा उठाया जा रहा है, वहीं इस विवाद के केंद्र में राजनीतिक आलोचना, जवाबदेही और सुरक्षा संबंधी संवेदनशीलता के बीच संतुलन का सवाल भी है। पूर्व सैन्य अधिकारियों की नाराजगी ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक बहस को फिर चर्चा में ला दिया है। सेना और सुरक्षा एजेंसियों का मनोबल बनाए रखना महत्वपूर्ण है, लेकिन लोकतंत्र में सरकार और सार्वजनिक संस्थाओं के कामकाज पर सवाल पूछना भी जवाबदेही का हिस्सा है। ऐसे में जरूरी है कि राजनीतिक आरोपों और उनके जवाबों का आकलन तथ्यों, प्रमाणों और संबंधित पक्षों के आधिकारिक वक्तव्यों के आधार पर किया जाए।