आवाज़ स्पेशल: कौन चुनता है देश का मुख्य चुनाव आयुक्त,कौन हटा सकता है?CEC की कुर्सी पर सरकार और विपक्ष की क्या होती है भूमिका?नियुक्ति से Removal तक समझिए पूरा संविधान”
भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) का पद देश की चुनावी व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों में से एक है। वर्तमान में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार है जिन्हें SIR विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े फैसलों को लेकर हटाने की मांग को लेकर दिल्ली समेत कई जगहों पर प्रोटेस्ट चल रहा है। इतना ही नहीं उनके निलंबन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में राकेश कुमार सिंह ने याचिका दायर की थी,जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल उन्हें इस पद से हटाने से इनकार कर दिया है।
मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से लेकर हटाने की प्रकिया एक बेहद जटिल प्रकिया है। आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं।
भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त यानी CEC का पद केवल एक प्रशासनिक पद नहीं, बल्कि संविधान से जुड़ा महत्वपूर्ण पद है। देश में लोकसभा, विधानसभा, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों की निगरानी करने वाले निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता को ध्यान में रखते हुए संविधान ने CEC को पद से हटाने के लिए बेहद कड़ी सुरक्षा दी है। वहीं CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का तरीका 2023 में बने नए कानून के बाद बदल गया। इस पूरी व्यवस्था को समझने के लिए संविधान के अनुच्छेद 324 से लेकर 2023 के कानून और सुप्रीम कोर्ट के 2023 के ऐतिहासिक फैसले तक की कड़ियों को समझना बेहद जरूरी है।
संविधान के अनुच्छेद 324(2) के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं, लेकिन यह नियुक्ति संसद द्वारा बनाए गए कानून के अधीन होती है। संविधान लागू होने के बाद लंबे समय तक नियुक्ति के लिए किसी अलग वैधानिक चयन समिति की व्यवस्था नहीं थी। व्यवहार में नियुक्ति राष्ट्रपति के नाम से होती थी और राष्ट्रपति केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करते हैं। 1991 में संसद ने Election Commission (Conditions of Service of Election Commissioners and Transaction of Business) Act बनाया, लेकिन इस कानून में CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कोई Search Committee या Selection Committee नहीं बनाई गई थी। नियुक्ति की संवैधानिक व्यवस्था मूल रूप से अनुच्छेद 324 के तहत ही चलती रही।
नियुक्ति की इसी व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट में 2015 में Anoop Baranwal की ओर से याचिका दायर की गई। जिसमें निर्वाचन आयोग जैसे संवैधानिक निकाय के सदस्यों की नियुक्ति में कार्यपालिका की भूमिका को किस तरह संतुलित किया जाए और क्या इसके लिए अधिक पारदर्शी एवं स्वतंत्र चयन व्यवस्था होनी चाहिए को लेके सवाल किए गए थे। मामला संविधान पीठ के पास पहुंचा और 2 मार्च 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि जब तक संसद इस संबंध में कानून नहीं बनाती, CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति तीन सदस्यीय समिति की सिफारिश पर करेंगे। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल किया गया। यदि लोकसभा में मान्यता प्राप्त नेता प्रतिपक्ष न हो तो सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को इस भूमिका में शामिल करने की व्यवस्था की गई।
सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था स्थायी कानून के रूप में नहीं बनाई थी। उसने स्पष्ट किया था कि यह व्यवस्था तब तक लागू रहेगी, जब तक संसद इस विषय पर कानून नहीं बना देती। इसके बाद केंद्र सरकार ने Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Bill, 2023 संसद में पेश किया। विधेयक 10 अगस्त 2023 को राज्यसभा में पेश हुआ, 12 दिसंबर को राज्यसभा और 21 दिसंबर को लोकसभा से पारित हुआ। राष्ट्रपति की मंजूरी 28 दिसंबर 2023 को मिली और यह Act No. 49 of 2023 बना। कानून 2 फरवरी 2024 से लागू हुआ। इस कानून ने 1991 के पुराने कानून को समाप्त कर दिया और नियुक्ति, कार्यकाल, सेवा शर्तों तथा निर्वाचन आयोग के कामकाज से जुड़े कई प्रावधानों को नए सिरे से तय किया।
नए कानून के तहत अब CEC और अन्य Election Commissioners की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं, लेकिन राष्ट्रपति को नाम की सिफारिश एक तीन सदस्यीय Selection Committee करती है। कानून की धारा 7 के अनुसार इस समिति में प्रधानमंत्री अध्यक्ष होते हैं, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सदस्य होते हैं और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री सदस्य होता है। यानी सुप्रीम कोर्ट के 2023 के अंतरिम फॉर्मूले में शामिल मुख्य न्यायाधीश की जगह नए कानून में प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को रखा गया है।
इससे पहले संभावित नामों की छंटनी के लिए Search Committee काम करती है। कानून की धारा 6 के तहत Search Committee की अध्यक्षता Cabinet Secretary करते हैं और इसमें दो अन्य सदस्य होते हैं, जो भारत सरकार में सचिव पद से नीचे के न हों। यह समिति पात्र व्यक्तियों का पैनल तैयार करके Selection Committee के सामने रखती है। हालांकि Selection Committee केवल Search Committee के पैनल तक सीमित नहीं है और कानून उसे पैनल में शामिल नामों के अलावा किसी अन्य व्यक्ति पर भी विचार करने की अनुमति देता है।
नए कानून के तहत CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों के लिए पात्रता भी निर्धारित की गई है। उम्मीदवार भारत सरकार में सचिव स्तर के पद पर कार्यरत या रह चुका होना चाहिए और उसे चुनावों के प्रबंधन एवं संचालन का ज्ञान और अनुभव होना चाहिए। कार्यकाल छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो पहले हो, निर्धारित है और पुनर्नियुक्ति का प्रावधान नहीं है।
इस पूरी प्रक्रिया में विपक्ष की भूमिका भी स्पष्ट रूप से तय है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष Selection Committee का सदस्य होता है, इसलिए CEC की नियुक्ति की प्रक्रिया में विपक्ष की सीधी संस्थागत भागीदारी रहती है। हालांकि कानून यह नहीं कहता कि नेता प्रतिपक्ष की सहमति अनिवार्य होगी या उसकी असहमति से नियुक्ति रुक जाएगी। समिति में प्रधानमंत्री अध्यक्ष और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री भी शामिल होते हैं। अंतिम नियुक्ति राष्ट्रपति के आदेश से होती है।
CEC को पद से हटाने की प्रक्रिया नियुक्ति से बिल्कुल अलग और कहीं अधिक कठिन है। इसका मूल आधार संविधान का अनुच्छेद 324(5) है। संविधान साफ कहता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस तरीके और आधार पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है। यानी केवल सरकार से असहमति, किसी चुनावी फैसले पर विवाद या राजनीतिक आरोप CEC को हटाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह सिद्ध दुराचार या अक्षमता का आधार होना आवश्यक है।
2023 के नए कानून की धारा 11 इसी विषय से संबंधित है। यह धारा वास्तव में “Resignation and Removal” है। इसमें CEC और अन्य Election Commissioners के इस्तीफे की व्यवस्था के साथ-साथ हटाने का प्रावधान भी दिया गया है। धारा 11(2) के तहत CEC को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है। वहीं अन्य Election Commissioners को CEC की सिफारिश के बिना नहीं हटाया जा सकता। पेंशन का प्रावधान अलग से धारा 13 में है।
CEC को हटाने की प्रक्रिया संसद से शुरू होती है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने के लिए लागू Judges (Inquiry) Act, 1968 की प्रक्रिया के अनुसार लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों या राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर वाला नोटिस दिया जा सकता है। संबंधित सदन के Speaker या Chairman के पास motion को स्वीकार करने या अस्वीकार करने का अधिकार होता है। केवल 100 या 50 सांसदों के हस्ताक्षर हो जाने से CEC अपने आप जांच या हटाने की प्रक्रिया में नहीं पहुंच जाता।
यदि प्रस्ताव स्वीकार किया जाता है तो जांच की प्रक्रिया शुरू होती है। इसके बाद तीन सदस्यीय जांच समिति आरोपों की जांच करती है। इसमें सुप्रीम कोर्ट का एक न्यायाधीश, किसी हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश और एक distinguished jurist शामिल होते हैं। CEC को आरोपों का जवाब देने और अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलता है। समिति की रिपोर्ट के बाद ही मामला संसद में आगे बढ़ सकता है।
यदि जांच में आरोप सिद्ध पाए जाते हैं और removal motion संसद में आता है तो लोकसभा और राज्यसभा दोनों को अलग-अलग प्रस्ताव पारित करना होगा। इसके लिए साधारण बहुमत पर्याप्त नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 124(4) के तहत दोनों सदनों में उस सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों में कम से कम दो-तिहाई बहुमत, दोनों शर्तें पूरी करनी होती हैं। दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति को removal address भेजा जाता है और राष्ट्रपति CEC को पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं।
इस तरह CEC की पूरी संवैधानिक यात्रा को तीन स्तरों में समझा जा सकता है नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं, नाम की सिफारिश वर्तमान कानून के तहत प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री वाली Selection Committee करती है; जबकि पद से हटाने के लिए संसद की बेहद कठोर प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। विपक्ष नियुक्ति की Selection Committee में सीधे मौजूद रहता है और removal motion शुरू करने के लिए निर्धारित संख्या में सांसदों के साथ पहल भी कर सकता है, लेकिन किसी CEC को अकेले विपक्ष या सरकार पद से नहीं हटा सकती।
ये अंतर CEC के पद को सामान्य सरकारी नियुक्तियों से अलग करता है। नियुक्ति के लिए अब कानून में सरकार और विपक्ष दोनों की भागीदारी है, जबकि हटाने के लिए संविधान ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जैसी सुरक्षा दी है। 2023 का कानून नियुक्ति की प्रक्रिया को वैधानिक रूप देता है, लेकिन CEC की removal protection का मूल आधार आज भी संविधान का अनुच्छेद 324(5) ही है।