वट सावित्री व्रत आजः सुहागिनों के लिए सबसे पावन दिन! सवा घंटे का शुभ मुहूर्त, शनि जयंती और शनिश्चरी अमावस्या का बना दुर्लभ महासंयोग

Vat Savitri fast today: the most sacred day for married women! A quarter-hour auspicious time, a rare coincidence of Shani Jayanti and Shanischari Amavasya.

रुद्रपुर। सुहागिन महिलाओं के सबसे महत्वपूर्ण और श्रद्धा से जुड़े पर्वों में से एक वट सावित्री व्रत आज यानी 16 मई को पूरे देशभर में पारंपरिक श्रद्धा, आस्था और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि पर रखा जाने वाला यह व्रत विवाहित महिलाओं के लिए अत्यंत विशेष माना जाता है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य, अखंड सौभाग्य और सुखी दांपत्य जीवन की कामना करते हुए निर्जला या फलाहार उपवास रखती हैं और पूरे विधि.विधान से वट वृक्ष की पूजा करती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन पतिव्रता सावित्री ने अपने तप, बुद्धिमत्ता और अटूट प्रेम के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। तभी से यह व्रत पति की दीर्घायु और वैवाहिक सुख के लिए रखा जाता है।

सुबह सिर्फ सवा घंटे का सबसे उत्तम पूजा मुहूर्त
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार ज्येष्ठ अमावस्या तिथि आज सुबह 05 बजकर 11 मिनट से शुरू होकर 17 मई की रात 01 बजकर 30 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि होने के कारण व्रत आज ही रखा जा रहा है। आज सुबह 07 बजकर 12 मिनट से 08 बजकर 24 मिनट तक का समय पूजा के लिए सबसे उत्तम माना गया है। यह कुल सवा घंटे का अत्यंत शुभ मुहूर्त है। इसके अतिरिक्त दोपहर 11 बजकर 50 मिनट से 12 बजकर 45 मिनट तक अभिजीत मुहूर्त में भी पूजा की जा सकती है। धार्मिक मान्यता है कि इस शुभ समय में की गई पूजा कई गुना फलदायी होती है।

इस बार बना दुर्लभ ग्रह संयोग, कई गुना बढ़ा व्रत का महत्व
इस वर्ष का वट सावित्री व्रत कई मायनों में बेहद खास और ऐतिहासिक माना जा रहा है। आज शनिवार होने के कारण शनिश्चरी अमावस्या और शनि जयंती का दुर्लभ महासंयोग बना है। इतना ही नहीं, मिथुन राशि में शुक्र और गुरु ग्रह की युति भी बन रही है, जिसे ज्योतिष में अत्यंत शुभ माना गया है। ज्योतिष विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा दुर्लभ संयोग वर्षों बाद बनता है, जिससे आज किए गए पूजन और व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है। मान्यता है कि इस शुभ योग में पूजा करने से पति.पत्नी के रिश्तों में प्रेम और स्थिरता आती है तथा घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

बरगद के पेड़ की पूजा क्यों होती है खास?
वट सावित्री व्रत में बरगद की पूजा का विशेष महत्व है। हिंदू धर्म में बरगद को अमरता, स्थायित्व और अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना गया है। आज महिलाएं आज नए वस्त्र धारण करती हैं, सोलह श्रृंगार करती हैं और पूजा की थाली सजाकर बरगद के पेड़ के नीचे एकत्रित होती हैं। वहां पेड़ की जड़ों में जल अर्पित किया जाता है, रोली, अक्षत, फूल और मिठाई चढ़ाई जाती है। इसके बाद महिलाएं कच्चा सूत या धागा पेड़ के चारों ओर लपेटते हुए परिक्रमा करती हैं और पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं।

सावित्री-सत्यवान की अमर कथा सुनने का विधान
वट सावित्री व्रत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सावित्री-सत्यवान की कथा सुनना है। कथा के अनुसार, जब सत्यवान की मृत्यु निश्चित थी और यमराज उनके प्राण हरने पहुंचे, तब सावित्री अपने पति के पीछे.पीछे चल पड़ीं। उनकी तपस्या, निष्ठा और बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने चतुराई से ऐसा वरदान मांगा कि उन्हें सौ पुत्रों की माता बनने का आशीर्वाद मिल गया। तब यमराज स्वयं धर्मसंकट में पड़ गए, क्योंकि बिना सत्यवान के यह संभव नहीं था। अंततः उन्हें सत्यवान के प्राण लौटाने पड़े। यही कथा भारतीय संस्कृति में पत्नी की अटूट निष्ठा, प्रेम और संकल्प की सबसे बड़ी मिसाल मानी जाती है।

अखंड सौभाग्य और सुखी दांपत्य का पर्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वट सावित्री व्रत रखने वाली महिलाओं को अखंड सौभाग्य, परिवार में सुख-शांति और पति की दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। आज देशभर के मंदिरों और वट वृक्षों के आसपास सुबह से ही महिलाओं की भीड़ उमड़ रही है। पूजा-अर्चना, कथा श्रवण और मंगल गीतों के साथ यह पर्व पूरे देश में श्रद्धा और उल्लास से मनाया जा रहा है। वट सावित्री व्रत सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में प्रेम, समर्पण, निष्ठा और वैवाहिक बंधन की अमर परंपरा का प्रतीक है।