उत्तराखंड:उष्ण कटिबंधीय गन्ने की खेती, वो भी पहाड़ों में?कभी सुना है?आश्चर्यजनक है पर सच है!ब्रिटिश काल से यहाँ हो रही है गन्ने की खेती,जैविक किसान नरेंद्र मेहरा के प्रयास से कुमाऊं का ये जिला बनेगा गन्ना उत्पादक जिला
पिथौरागढ़ जिला भारत के उत्तराखंड राज्य का सबसे पूर्वी हिमालयी जिला है। यह प्राकृतिक रूप से उच्च हिमालयी पहाड़ों, बर्फ से ढकी चोटियों, दर्रों, घाटियों, अल्पाइन घास के मैदानों, जंगलों, झरनों, बारहमासी नदियों, ग्लेशियरों और झरनों से घिरा हुआ है। पिथौरागढ़ समुद्र तल से 1645 मीटर की उंचाई पर स्थित है। पिथौरागढ़ का क्षेत्रफल 2,788 वर्ग मील है, पिथौरागढ़ का अधिकांश भाग पहाड़ी एवं ऊबड़-खाबड़ है। यहां गन्ने की खेती की कल्पना करना भी आश्चर्यजनक हो सकता है क्योंकि गन्ना एक उष्ण कटिबंधीय पौधा है जिसके लिए लंबी अवधि की गर्मी में पर्याप्त धूप और तापमान के अलावा अच्छी खासी बारिश की भी ज़रूरत पड़ती है। गन्ने की फसल के लिए जलवायु का बड़ा प्रभाव पड़ता है। पिथौरागढ़ एक पहाड़ी इलाका है बावजूद इन सब विपरीत परिस्थितियों के यहां ब्रिटिश काल से गन्ने की खेती की जा रही है। जी हां! सुनने में ये आश्चर्यजनक ही है लेकिन यहां के कुछ गांव ऐसे है जहां बरसो से किसान गन्ने की खेती को गृह उद्योग के रूप में अब तक चला रहे है। यहां कभी कुटीर उद्योग के रूप में गुड़ भी बनाया जाता था।

ये जानकारी जैविक खेती में पिछले कई सालो से काम कर रहे हल्द्वानी निवासी किसान नरेंद मेहरा को मिली तो वो भी हैरान हो गए। इसकी सत्यता जांचने के लिए नरेंद्र ने वहाँ के किसानों से दूरभाष संपर्क किया तब उन्हें पता चला कि ब्रिटिश काल से ही पिथौरागढ़ में गन्ने की खेती होती आ रही है। उन गन्नो से तैयार किया गया गुड़ अंग्रेजों को बेहद पसंद हुआ करता था। भारतीयों से ज़्यादा अंग्रेज ही उनके ज़्यादा ग्राहक हुआ करते थे।

जैविक किसान नरेंद्र मेहरा
ये सब सुनकर नरेंद्र ने ये बात गन्ना विकास विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को बताई। गन्ना एवं चीनी आयुक्त उत्तराखंड हंसा दत्त पांडेय ने मामले पर शोध करने के लिए डॉ रीना नौलिया को ज़िम्मेदारी सौंपी। और यहाँ से शुरू हुई पिथौरागढ़ में हो रही गन्ने की खेती को बढ़ावा देने,किसानों और ग्रामीणों को स्वरोजगार देने की मुहिम। डॉ रीना ने पिथौरागढ़ जिले के किसानों से गन्ने के खेती से सम्बंधित सभी महत्वपूर्ण जानकारी जुटाई। यहां डेढ़ सौ से ज़्यादा किसान आज भी गन्ने की खेती कर रहे है। वहाँ के गन्ने परीक्षण के लिए पंतनगर विवि के वरिष्ठ वैज्ञानिक एएस जीना को सौंपा गया है। इस कार्य के लिए नीलेश संयुक्त निदेशक गन्ना किसान शोध संस्थान काशीपुर भी अपना विशेष योगदान दे रहे है।
यहां आपको जानकर एक और आश्चर्य होगा कि उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी के पैतृक गांव हड़खोला में भी गन्ने की खेती होती है ये बात इसी शोध के दौरान पता चली,ये गांव भी पिथौरागढ़ जिले में ही आता है।गन्ना आयुक्त ने मीडिया को बताया कि पिथौरागढ़ में स्वयं सहायता समूह गन्ने के रस को पाउच में बेच सकते है,जो वही उन्हें स्वरोजगार से जोड़ सकता है।
नरेंद्र मेहरा ने बताया कि ब्रिटिश काल में जैविक खेती की आवश्यकता ही नही पड़ती थी क्योंकि सभी चीजें शुद्ध होती थी आज खेत से निकलकर जो सब्जियां घरों तक पहुंचती है उनमें ज़हर की मात्रा भी होती है। हमारा मकसद थाली से उस ज़हर को मिटाना है। उन्होंने बताया कि हम जैविक खेती करते है ताकि लोगो को प्रेरणा मिल सके। पिथौरागढ़ में जितने किसान गन्ने की खेती करते है वो केवल गोबर की खाद से ही गन्ना उगाते है। पिथौरागढ़ के अलावा चमोली जिले में भी गन्ने की पैदावार हो सकती है,क्योंकि वहां की भूमि और वातावरण भी गन्ने की फ़सल के लिए अनुकूल है। हालांकि पिथौरागढ़ में गन्ने की फसल को जानवरों से नुकसान हो रहा है,इसके लिए भी कोई व्यवस्था करवाई जानी आवश्यक है।वही आयुक्त हंसा दत्त पांडे ने कहा कि फरवरी में पिथौरागढ़ के किसानों को विशेष प्रजाति का गन्ना दिया जायेगा।गन्ना किसानों की संख्या बढ़ने पर पिथौरागढ़ को भी उधमसिंह नगर और हरिद्वार की तरह गन्ना उत्पादक क्षेत्र घोषित कराने की दिशा में कार्यवाही शुरू की जायेगी