उत्तराखण्डः जनजाति सलाहकार परिषद के सदस्यों की सत्यनिष्ठा और सार्वजनिक आचरण पर हाईकोर्ट में उठे सवाल! गीताराम गौड़ के खिलाफ लंबित मामलों का याचिका में जिक्र
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने देहरादून की अनुसूचित जनजाति समुदाय से स्वयं संबंध रखने वाली जनहित याचिकाकर्ता बचना शर्मा द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की। जनहित याचिका में उनके द्वारा उत्तराखण्ड जनजाति सलाहकार परिषद के सदस्यों की सत्यनिष्ठा, सार्वजनिक आचरण तथा अनुसूचित जनजाति समुदाय के कल्याण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता सुनिश्चित किए जाने का महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया गया। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी मुद्दा उठाया गया कि उत्तराखण्ड अनुसूचित जनजाति सलाहकार परिषद नियमावली, 2014 में ऐसे स्पष्ट प्रावधान का अभाव है, जो परिषद के सदस्यों की सत्यनिष्ठा तथा अनुसूचित जनजाति समुदाय के कल्याण के लिए उनके योगदान को अनिवार्य रूप से विचार में लेने की व्यवस्था करता हो। इसके विपरीत, उत्तराखण्ड अनुसूचित जनजाति अधिनियम, 2015 की धारा 4(2) के प्रावधान का हवाला देते हुए यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि संबंधित समिति के सदस्यों की सत्यनिष्ठा एवं अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए उनके द्वारा किए गए कार्यों को महत्व दिया जाना चाहिए। याचिका में उत्तराखण्ड अनुसूचित जनजाति सलाहकार परिषद के उपाध्यक्ष गीताराम गौड़ का उदाहरण देते हुए उनके विरुद्ध कथित रूप से लगभग 18 से 20 आपराधिक मामलों एवं शिकायतों के लंबित होने का उल्लेख किया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से यह प्रश्न उठाया गया कि जनजातीय समुदाय के हितों एवं कल्याण से जुड़े महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन करने वाले पदों पर नियुक्ति अथवा पदधारण के संदर्भ में संबंधित व्यक्तियों की सत्यनिष्ठा, आचरण और सार्वजनिक उत्तरदायित्व पर उचित विचार किया जाना आवश्यक है। इन मामलों एवं शिकायतों का उल्लेख याचिका में उठाए गए आरोपों के संदर्भ में किया गया है। उनकी स्थिति एवं गुण-दोष का निर्धारण संबंधित सक्षम प्राधिकारी द्वारा अभिलेखों के आधार पर किया जाना अपेक्षित है। सुनवाई के उपरांत हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण करते हुए याचिकाकर्ता को संबंधित सक्षम प्राधिकारी के समक्ष दो सप्ताह के भीतर अपना प्रत्यावेदन प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता प्रदान की। न्यायालय के आदेशानुसार, सक्षम प्राधिकारी को उक्त प्रत्यावेदन पर उत्तराखण्ड अनुसूचित जनजाति अधिनियम, 2015 की धारा 4(2) के आलोक में नौ माह के भीतर निर्णय लेने के निर्देश दिए गए हैं। यह मामला अनुसूचित जनजाति समुदाय के प्रतिनिधित्व से जुड़ी संस्थाओं में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व तथा सार्वजनिक पदों पर आसीन व्यक्तियों की सत्यनिष्ठा के महत्व को रेखांकित करता है। अब सक्षम प्राधिकारी द्वारा प्रत्यावेदन पर विचार करते समय संबंधित विधिक प्रावधानों और उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर निर्णय लिया जाना है। आज मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश मनोज कुमार तिवारी और सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ में हुई।